मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
Page 100 of 365
Read in contextवियोगाभिव्यक्ति ४१ पाठान्तर २, बाई म्हारे नैन रावल भेष । बिना श्याम सखी मे जटाधारी, सेली अंजन रेख । सुवेद वरण अग कत्था राजै, भिक्षा मांगूं देश । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, करूंगी अलख अलेख ।† उपर्युक्त तीनो ही पाठो से कोई भी अर्थ स्पष्ट नही होता । १९ डाल गयो रे गल मोहन फॉसी । ऊँची सी अटाली पर मेहुँडा बरसत, बूँद लगी जसी तीर की गॉसी । अँबुवा की डाली पर कोयल बोलत, म्हॉरो तो मरनो भयो थॉरी भयी हॉसी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, थे तो मेरा ठाकुर, मै तो थॉरी दासी ॥४७॥† उपर्युक्त पद मे वसत और वर्षा का वर्णन एक ही साथ हुआ ह, यह असगत प्रतीत होता है । पाठान्तर १, डारि गयो मन मोहन फासी । ऑबा की डाली कोयल इक बोले । मेरो मरण अरु जग केरी हॉसी । बिरह की मारी मै बन बन डोलूँ । प्राण तजूं, करवत ल्यूँ कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर । तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी ।†