मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ज्या श्री चरणा सो म्हारो दुख जासी, चरणखोल१ जल पायजोजी। दरद दिवानी मीराँ वैद सांवलियो, सूती ने आण जगायजोजी। मीराँ तो दासी थारी जनम की, चरण कमल चित लायजोजी। ॥७१॥ ४४ थारें रग रीझी रसिक गोपाल। निस वासर मै रटूँ निरतर, दरसण द्यो नन्दलाल। सो पतिव्रत टरै र्जिन टारो, मति बिसरो नन्दलाल। कोऊ कहै नन्दो कोऊ कहै बन्दौ, चला भावती चाल। सो पथ भलि केरो जिन साधो, म्हांरो मणि उरमाल। प्रेम भरी मीराँ जिन गरबै, हरि है गिरधर लाल। ॥७२॥+ पदाभिव्यक्ति असंगत है। प्रथम पक्ति मे 'रग' के बदले 'गुण' और अन्तिम पक्ति मे 'गरबै' के बदले 'गरजै' का प्रयोग भी मिलता है। अन्तिम भक्ति पद की प्रामाणिकता का विरोध इगित करती है। ४५ गिरधर रूसणूँ जी कोन गुनाह। कछु इक औगुण काढो म्हा मै, म्हैं भी कानां सुणा। मै दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणा२। काँई बात सूँ करवौ रूसणूँ, क्यो दुःख पावो छो मना। किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणा३। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, थारो ही नांव गणा४ ॥७३॥+ पद के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। १ चरण धोकर, २ गुणयुक्त, ३० बहुत, ४ गिनना, निरन्तर जपना।