BharatKosha
Back to the archive

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

DevanagariRajasthanipublished365 pages

६. आत्म-समर्पण, ज्ञान-वैराग्य व उपसंहार

Page 326Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७५ राधा वर्णन राजस्थानी में प्राप्त पद १ मोहन जावो कठे¹ सावरियाँ मोहन जावो कठे। तुम रहो न अठे² सावरियाँ मोहन जावो कठे। गोकुल बसवो फीको लागे, मथुरा मे काई लडु बटे। नित को आणो जाणो छोडि दे, नित के आये जाये से तेरा मान घटे। राधा रुक्मण और सतभामा, कुब्जा ने कोई लीनी पटे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे ॥४९६॥† पाठान्तर १, जावो कठे रे रामा, रह्वो अठे सांवरियां। नित काई जावो, नित कांई आवो, नित का जाया से मान घटे। गोकुल बसवो फिकोई लागे, मथुरा मे काई लाडु बटे। गोकुल मे काई धेनु चरावे, मथुरा मे काई राज लुटे। राधाई रुक्मण और सतभामा, कुब्जा काई थारे संग पटे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तुम सुमरॉ सूं सकट कटे। उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो मे पूर्वापर सबध का अभाव है। 'चन्द्रसखी' के नाम पर प्रचलित एक ऐसा निम्नाकित पद मिलता है जिसका उपर्युक्त पदो से गहरा साम्य है। कांई मिस आया छोजी राज अठे। राय आगणिये ठाढा रहियो, आगे जावोला³ कठे। राधा रुक्मण अर सतभामा, कुब्जा ने कांई लीनो पटे। १ कहाँ, २ यहाँ, ३ जावेगे।

Page 327Permalink

२७६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह हाथ को हीरो खोय दियो है, खोटी लाल सटे । चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, लीनी है सीस सटे । उपर्युक्त पदो के साम्य को देखते हुए चन्द्रसखी का ही यह पद कुछ हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर भी चल पडा हो, ऐसा असम्भव नही प्रतीत होता । २ आली ! म्हाने लागे वृन्दावन नीको । घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोविन्द जी को । निरमल नीर बहुत जमुना मे भोजन दूध दही को । रतन सिघासन आप विराजै, मुगट धर्यो तुलसी को । कुजन कुजन फिरत राधिका, सबद सुनत मुरली को । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भजन बिना नर फीको ॥४९७॥ ३ उधो ! म्हांने लागे वृन्दावन नीको रे । वृन्दावन मे धेनु बोहोत है, भोजन दूध दही को । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, सिर केसर को टीको । घर घर मे तुलसी को बिड़लौ, दरसण माधवजी को रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी बिना सब फीको रे ॥४९८॥ उपर्युक्त दोनो पदो का गहरा साम्य विचारणीय है। बहुत सम्भव है कि ये दो स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के गेय रूपान्तर हो ।

Page 328Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७७ मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ आवत मोरी गलियन मे गिरधारी, मै तो छुप गई लाज की मारी। कुसुमल पाग केसऱ्या जामा, ऊपर फूल हजारी। मुकुट ऊपरै छत्र विराजे, कुडल की छवि न्यारी¹। केसरी चीर दरियाई को लेगी, ऊपर अगिया भारी। आवते देखे किसन मुरारी, छुप गई राधा प्यारी। मोर मुकुट मनोहर सोहै, नथनी की छवि न्यारी। गल मोतियन की माल विराजे, चरण कमल बलिहारी। ऊभी² राधा प्यारी अरज करत है, सुर्ण जे किसन मुरारी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पर बारी ॥४९९॥† पद को तीन अंशो मे बाँटा जा सकता है। प्रथमांश "आवत मोरी अगिया भारी" मे अपनी व्यक्तिगत भावो की अभिव्यक्ति है। "आवते देखे ∙∙ ∙किसन मुरारी" लगभग प्रथम पंक्ति की ही पुनरुक्ति है। परन्तु जहाँ प्रथम पंक्ति मे अपनी भावनाओ का ही वर्णन हुआ है, वहाँ द्वितीयांश मे उन्ही भावों का राधा मे आरोप किया गया है। तृतीयांश "ऊभी राधा पर बारी" का शेष पद से समन्वय ही नही होता। ऐसे संगति-हीन पदों की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। २ थाने कुब्जा ही मनमानी, हम सो न बोलना हो राज। हमरी कहा सुनी विष लागे, वाहा जाय प्रेम रस पागे। उन संग हिलमिल रहना, हँसना बोलना हो राज। हम सो कहे सिगार उतारो, दृग अंजन सब ही धोयँ डारो। १ अपूर्व, २ खडी हुई।

Page 329Permalink

२७८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह छापा तिलक सवारो, पहिरो चोलना हो राज। जमना के तट धेनु चरावै, बेसी मे कछु अचरज गावै। नई नई तान सुनावै, छाछ मछोलना जी राज। म्हारी प्रीत तुम्ही सो लागी, कुल मरजाद सब ही हम त्यागे। मीराँ के प्रभु गिरधारी, बन बन डोलना हो राज ॥५००॥† इस पद को भी स्पष्ट ही दो भागो मे बाँटा जा सकता है। “थाने कुब्जा हो ····चोलना हो राज।” प्रथमाशं है। बीच की दो पक्तियो “जमुना के तट ····छाछ मछोलना जी राज” का पूर्वा श से कोई सबन्ध नही प्रतीत होता। “छाछ मछोलना जी राज” जैसी अभिव्यक्ति भी निरर्थक ही प्रतीत होती है। फिर पद की आठवी पक्ति का सबन्ध पूर्वार्द्ध से ही जुडता है, जब कि अन्तिम पक्ति सम्पूर्ण पद से भिन्न पड़ती है। अन्तिम पक्ति मे “मीराँ क प्रभु गिरधारी” जैसा प्रयोग भी सर्वथा नूतन है। पद की भाषा मे राजस्थानी और भोजपुरी का सम्मिश्रण हुआ है, जिसका कारण एकमात्र गेय परम्परा ही हो सकती है। पाठान्तर १, थारे कुब्जा ही मनमानी, म्हाँसूँ अनबोलना हो राज। हम से कहै सुहाग उतारो, दृग अंजन सब ही धो डारो। माथे तिलक चढावो, पहरो चोलना हो राज। हमरी कही बिषै सम लागै, घर घर जाय भवर रस पागै। उन्ही के सग रहना, हँसना बोलना हो राज। वृन्दावन मे धेनु चरावै, बसी मे कछु अचरज गावै। बाकी तान सनावै, छतिया छोलना१ हो राज। हमरी प्रीत तुम्ही सग लागे, लोक लाज सब कुल को त्यागी। मीराँ के प्रभु गिरिधर, बन बन डोलना हो राज।† १ छीलना, जलाना।

Page 330Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७९ पाठान्तर २, थाके दासी ही मनमानी, म्हाँसे अनबोलना हो राज। हमकं कहै सिगार उतारो, दृग अजन सबही धो डारो। माँथे तिलक लगावो, पहैरो चोलणा हो राज। कुबज्या कंवर कंस की दासी, ज्यां देखवाँ मोये आवत हाँसी। ज्यो पटराणी कीनी, हँस बोलणां म्हाराज। कुबज्या के संग भोग बनायो, हमको लिख कर जोग पठायो। मीराँ भई दिवानी, बन बन डोलणा हो राज।† ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ तेरो कान्ह कालो हो भाई, मेरी राधे गोरी हो। ऐसी राधे रूप बनी, कंचन सी देह ठनी। ऐसो कारो कान्ह पर, कोटि राधे वारी हो। गोकुल उजार कीनो, मधुरा बसाय लीनी। कुब्जा कूं राज दीनो, राधे को बिसारी हो। बिनती सुनो ब्रजराज, लागूँगी तुम्हारे पाय। मीराँ प्रभु सों कहीयो जाय, सेवक तुम्हारी हो ।।५०१।।† इस पद मे भी भाव सामंजस्य नही है। "तेरो कान्ह ॰ ॰ ॰ ॰राधे वारी हो" प्रथमांश मे स्पष्ट है कि कथनोपकथन दो व्यक्तियो के बीच हो रहा है। “गोकुल उजार ॰ ॰ ॰ ॰बिसारी हो” वाला अंश एक शिकायत के रूप मे ही आता है जिसका प्रथमाश से कोई सबन्ध नही प्रतीत होता। छठी पंक्ति मे बिनती स्वय “ब्रजराय” को ही सुनायी गयी है, जब कि अन्तिम पंक्ति से यही स्पष्ट होता है कि “ब्रजराय” तक सदेशा पहुँचा देने की "बीनती" किसी अन्य से की जा रही है। एक ऐसा ही पद चन्द्रसखी के नाम पर भी पाया जाता है -

Page 331Permalink

२८० मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह ‘“कैसे व्याहूँ राधे, कन्हैयो तेरो कारो भाई । घर घर री वो गऊ चरावै, ओढण कबल कारो । छीन झपट दही खात बिरज मे, चलैगो कैसे राधे को गुजारो । मेरी राधा अजब सुंदरी, तेरो कन्हैया कारो । कारो कारो मत करो, कान्हो है बिरज को उजियारो । नाग नाथ रेती पर डारयो, मारी फूँक कृष्ण भयो कारो । पीताम्बर की कछनी काछै, मोहन मुरली वारो । चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि, कान्ह त्रिलोकी सूं न्यारो ।’’ दोनो पदों मे भाव और भाषा साम्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि चन्द्रसखी का ही पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो गया है। २ झूलत राधा सग गिरिधर । अबीर गुलाल उडावत, राधा भरि पिचकारी रग । लाल भईं वृन्दावन, जमुना केशर चूवत रग । नाचत ताल अधर सुर भरे, धिम धिम बाजे मृदग । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरन कमल कूँ रग ॥५०२॥† प्रथम पक्ति मे राधा का कृष्ण के सग झूलने की और शेष पद मे होली खेलने की ही अभिव्यक्ति है। पद की तीसरी पक्ति और अन्तिम पक्ति का द्वितीयांश “चरन कमल कूँ रग” अर्थहीन प्रतीत होता है। ° पाठान्तर १, झुलत राधा सग गिरिधर, झुलत राधा संग । अबील गुलाल की धुम मचाई, डारत पिचकारी रग । लाल भयो वृन्दावन जमना, केसर चुवत अनग । नाचत ताल अधारे सुर सुन्दरी, डारी डारी बाजे ताल मृदंग । मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल कूं बहोत रंग ।

Page 332Permalink

२८२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ कैसे आवों हो नन्दनलाल तेरी ब्रजनगरी, गोकुल नगरी। इत मथुरा उत गोकुल नगरी, बीच बहे जमुना गहरी। पाँव धर्यौँ मेरी पायल भीजै, कूदि परौ वहि जाओ सारी। मै दधि बेचन जात वृन्दावन, मारग मे मोहन झगरी। बरज यशोदा अपने लाल को, छीन लई मोरी नथली। रहु रहु ग्वालिन झूठ न बोलो, कान अकेलो तुम सगरी। मेरो कन्हैया पाँच बरस कौ, तुम ग्वालन अलमस्त भई। जाय पुकारो हो कंस राजा से, न्याय नही तेरी गोकुल नगरी। वृन्दाबन की कुज गलिन मे, बाँह पकर राधे झगरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साधु संग करि हम सुधरी ॥५०४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर संबंध और संगति का अभाव है। तृतीय पंक्ति “पाँव धर्यौँ”· · जाओं सारी” सर्वथा अर्थहीन है। “झूठ न बोलो,” “तेरी,” “तुम” आदि शब्दो से पद की भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है। “अलमस्त” शब्द का प्रयोग उर्दू के प्रभाव को भी इंगित करता ह। इसी प्रकार का एक पद मीराँ के नाम पर प्रचलित गुजराती पदों मे भी प्राप्त है। ५ हमरो प्रणाम बाँके बिहारी को। मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे, कुडल अलकाकारी को। अधर मधुर पर बसी बाजे, रीझ रीझावै राधा प्यारी को। यह छवि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरिधारी को ॥५०५॥† अन्तिम पंक्ति की शैली सर्वथा नूतन है। ६ झट द्यो मेरो चीर रे मोरारी रे, झट द्यो मेरो चीर। मेरो चीर कदम चढ बैठो, मै जल बीच उघाडी।

Page 333Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८३ हाँरे वा'ला मै जलबीच उघाडी । उभी राधा अरज करत है, दो चीरदो ओ गिरधारी । प्रभु मैं तेरे पाय परूँगी । जो राधा तेरो चीर चहावत हो, जल से हो जा न्यारी । हाँ रे, वा'ला जल से हो जा न्यारी । जल से न्यारी कान्हा कबुए न होव्गी, तुम हो पुरुष हम नारी । लाज मोकूँ आवत भारी । तुम तो कुँवर नन्दलाल कहावो, मैं बृषभानु दुलारी । हाँ रे, वा'ला मे वृषभानु दुलारी । मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, तुम जीते हम हारी । चरण जाऊँ बलिहारी ॥ ५०६ ॥† उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली का और शैली पर गुजराती भाषा मे प्राप्त पदों की शैली का प्रभाव सुस्पष्ट है । गुजराती में प्राप्त पद १ वारो यशोदा तारा दानी ने, आली गारा आल करे छे । लाडकवायो बाई लामज तमने, ते थी घनो राधा राणी ने । जल यमुना जतॉ मारगे पालव, ग्रहियो मारो तानी न । एक बार साख्युं बीजी बार साख्युं शरम तमारी घनी आनी ने । बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित मानी ने ॥५०७॥† २ बोले झीणा मोर, राधे तारा डुँगरिया पर बोलेझीणा मोर । ए मौर ही बोले ब पैया ही बोले, कोयल करे घन शोर । ······भली बीजली चमके, बादल हुआ घन घोर । झरमर झरमर मेहुलो बरसे, भीजे मारा सालुडानी कोर । बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण,प्रभुजी म्हाँरा चितडानो चोर॥५०८॥†

Page 334Permalink

२८४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ३ काहानो माग्यो दे,धुतारो माग्यो दे,वर तो राधानो,मने कहानो माग्यो दे। वृन्दारे वनमाँ जेदी रास रम्याँ, ता सोल से गोपी माँ घेलो कहान। हाथी ने घोडा बाई माल खजाँना, हैया केरो हार ले मान। तल भर जव भर वछो नव कीधो, जवे तोली ने पाछो ले। बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल मे चित दे ॥५०९॥† बाँसुरी वर्णन ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ कान्हा रसिया वृन्दाबन बासी। जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे,मुरली बजावे मृदुलासी। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, श्रवण कुडल फलासी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिना मोल की दासी ॥५१०॥ पाठान्तर १, म्हारी बालपना की परीति थे निभाज्यो रैना। जमुना के नीराँ तीराँ धेनु चरावै, कुडल झलकत काना। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हर नौ माह रो धाना। यह पद उपर्युक्त पद का गेय रुपान्तर मात्र प्रतीत होता है, क्योकि प्रथम पंक्ति के सिवा सम्पूर्ण पद की भाव और भाषा भी लगभग एक ही है। विभिन्न स्थानो पर प्रचलित होने के कारण स्थानीय बोलियो का प्रभाव पदो से स्पष्ट होता है। पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव स्पष्ट है। इस रूपान्तर की अभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। इसी पद से साम्य रखता एक और भी निम्नांकित पद प्राप्त है -- या मोहँन के मै रूप लुभानी। सुन्दर वदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मद मुसकानी।

Page 335Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८५ जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावै, बसी मे गावै मीटी बानी । तन मन धन गिरिधर पर बारूँ, चरण कवल माही लपटानी । २ आजु मै देख्यो गिरधारी । सुन्दर बदन मदन की शोभा, चितवन अनियारी । बजावत वशी कुज मे । गावत ताल तरग रंग ध्वनि, नाञ्चत ग्वाल गन मे । माधुरी मूरति वह प्यारी । बसि रहै निस दिन हिरदै बिच, टरै नही टारी । वाही पर तन मन हो वारी । वह मूरति मोहनि निहारत, लोक लाज डारी । तुलसी बन कुंजन सचारी । गिरिधर नवल नटनागर मीराँ बलिहारी ॥ ५११ ॥ ३ प्यारी मै ऐसे देखे श्याम । बाँसुरी बजावत गावत कल्याण । कब की ठाढी भैयाँ, सुध बुध भूल गैयाँ । छौने जैसे जादू डारा, भूले मोसे काम । जब धुन कान पैयाँ, देह की ना सुध सैयाँ । तन मन हर लीन्हो, विरहो वाले कान्ह । मीराँ बहि प्रेम पाया, गिरिधर लाल ध्याया । देह सो विदेह भैयाँ, लागो पग ध्यान ॥५१२॥† उपर्युक्त पद मे तीन विभिन्न बोलियो का सम्मिश्रण विचारणीय है । पद की भाषा प्रमुखत ब्रज है तथापि क्रियापदो पर पजाबी प्रभाव स्पष्ट है । “मै ऐसे देखे श्याम”, “पाया” आदि प्रयोगो से आधुनिक प्रभाव भी स्पष्ट हो उठता है । निम्नाकित एक और पद ऐसा मिलता है जिसकी प्रथम पक्ति उपर्युक्त पद की प्रथम पक्ति का पाठान्तर प्रतीत होती है, परन्तु शेष पद सर्वथा विभिन्न पडता है ।

Page 336Permalink

२८६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ कही ऐसे देखे री घनश्याम । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल झलकन काना । साँवरी सूरत पर तिलक बिराजे, तिस मे लगे रहे मेरे प्राना । बरसाने सो चली गुजरिया, नन्दग्राम को जाना । आगे केशव धेनु चरावे, लगे प्रेम के बाना । सागर सूखि कमल मुरझाना, हंसा किया पयाना । भौरे रह गये प्रीति के धोखे, फेर मिलन को जाना ॥५१३॥† इस पद मे कही से भी यह स्पष्ट नही होता कि यह पद किस के द्वारा बनाया गया है, तथापि तथाकथित मीराँ क पदसंग्रहो मे प्राप्त हैं। पदाभिव्यक्ति स्पष्ट ही अर्थहीन है। ५ बाँके साँवरियाँ ने घेरि मोहि आन के। जो गई जमुना जल भरन, मारग रोक्यो मेरो आन के । वृन्दाबन की कुज गलिन मे मुरली बजावे, आन तान के । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रीत पुरातन जान के ॥५१४॥† ६ भई हो बावरी सुन के बाँसुरी । श्रवण सुनत गोरी सुध बुध बिसरी, लगी रहत तामे मनकी बाँसुरी । नेम धरम कोन कीनी मुरलिया, कौन तिहारे पासुरी । मीराँ के प्रभु वश कर लीन्हे, सप्त ताननि की फाँसुरी॥५१५॥† पद की तृतीय पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता । ७ मुरलिया बाजे जमुना तीर । मुरलि सुनत मेरो मन हरि लीन्हों, चीत धरत नही धीर । कारो कन्हैया, कारी कामरिया, कारो जमुना को नीर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पै सीर ॥५१६॥†

Page 337Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८७ ८ मोरे अगना मे मुरली बजाय गयो रे । छोटे छोटे चरण, बडे बडे नयना, वृन्दाबन की कुज गलिन मे, मारि गयो सयना ' मेरी आली, मेरी आली कहो कित जाऊँ, मुरली मे गावै लै लै मेरो नाम । ऊँची नीची घाटी, मोसे चढऊँ न जाय, मुरली की धुनि सुनि, मोसे रहऊँ न जाय । कित गई गैया, कित गए ग्वाल, कित गये बसी बजावन हारा । घर आई गैया, घर आये ग्वाल, अजहूँ न आये मेरे मदन गोपाल । मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, पाये.है दर्शन भई निहाल । ॥५१७॥† उपर्युक्त पद मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। पद स० ३ और उपर्युक्त दोनो पदो मे 'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर' न होकर "मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल" का ही प्रयोग हुआ है, जो विचारणीय है । ९ कवन गुमान भरी बसी, तू कवन गुमान भरी । अपने तन पै छेद परेचे, बाला तूं बिछरी । जाँत पाँत सब तेरो मै जाणूँ, तू बन की लकरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राधा से क्यूँ झगरी ॥५१८॥† पद की दूसरी पक्ति का द्वितीयाश “बाला तू बिछरी” अर्थहीन प्रतीत होता है। ऐसा ही एक पद सूरदास का भी प्राप्त है .- बाँसुरी तू कवन गुमान भरी । सोने की नाही, रूपे की नाही, नाही रतन जरी । जात सिफत तेरी सब कोई जानै, मधुवन की लकरी ।

Page 338Permalink

२८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह क्या री भयो जब हरि मुख लागी, बाजत विरह भरी । सूरदास प्रभु अब क्या करिये, अधरन लागत री । ( 'बृहद्राग रत्नाकर' पद १५०, पृष्ठ ४८ ) उपर्युक्त पदो मे भाव और भाषा देखते यही अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि सूरदास का ही पद मीराँ के नाम पर भी चल पडा हो । १० राधा प्यारी दे डारो जू बसी हमारी । ये बसी मे मेरा प्राण बसत है, वो बसी गई चोरी । ना सोने की बसी, ना रूपे की, हरे हरे बाँस की पोरी । घडी एक मुख मे,घडी एक कर मे,घडी एक अधर धरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर चरण कमल पर बरी ॥५१९॥† पाठान्तर १, श्री राधे रानी, दे डारो बंसी मोरी । जा बसी मै मेरो प्राण बसत है, सो बसी गई चोरी । काहे से गाऊँ, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरी । मुख से गाओ कान्हा,हाथो से बजाओ,लकुटी से लाओ गैया घेरी । हा हा करत तेरे पैया परत हूँ, तरस खाओ प्यारी मोरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बसी लेकर छोडी । उपर्युक्त पाठान्तर में पहले पद से कुछ अधिक पक्तियाँ है । साथ ही इस पाठान्तर की भाषा के क्रिया पदो पर आधुनिक प्रभाव विशेष विचारणीय है । भाव और भाषा साम्य रखता हुआ एक ऐसा ही पद 'चन्द्र सखी' के नाम पर भी प्रचलित है -- श्री राधे रानी, दे डारो ना बाँसुरी मोरी । जा बंसी मे मेरो प्राण बसत है, सो बंसी गई चोरी ।

Page 339Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २८६ सोने की नाही कान्हा, रूपे की नाही, हरे बाँस की पोरी । काहे से गाऊँ राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरी । मुख से गाओ प्यारे, ताल से बजावो, लकुटिया से लाओ गैया घेरी चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, हरि चरणन की चेरी । ११ चालो मन गंगा जमुना तीर । - गंगा जमुना निरमल पाणी, सीतल होत सरीर । बसी बजावत गावत कान्हा, सग लियो बलबीर । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल झलकत हीर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल पै सीर ॥५२०॥ उपर्युक्त पद मे कुछ पक्तियाँ निम्नांकित रूप मे भी प्राप्त है - द्वितीय पंक्ति :- “या बसी मे मेरो प्राण बसत है, वो बसी लेई गई चेरी ।” चतुर्थ पंक्ति मे “घड़ी” शब्द के बदले 'घटी” का भी प्रयोग मिलता है । १२ बसीवारे हो कान्हा मोरी रे गागरी उतार । गगरी उतार मेरो तिलक सभार । यमुना के नीरे तीरे बरसीलो मेह, छोटे से कन्हैया जी सू लागो म्हाँरो नेह । वृन्दाबन मे गऊएँ चरावे, तोर लियो गरवा को हार । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तोरे गई बलिहार ॥५२१॥† पदाभिव्यक्ति मे संगति नही है । उपर्युक्त पद की शैली का चन्द्रसखी के पदो की शैली से बहुत साम्य है । १६

Page 340Permalink

२६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १३ तो सो लाग्यो नेहरा, प्यारे नागर नंद कुमार । मुरली तेरी मन हर्यो, विसर्यो घर व्यवहार । जब ते श्रवननि धुनि परी, घर आगण न सुहावै । पारधि ज्यूँ चूकै नही, मृगी बेधि दई आय । पानी पीर न जानई ज्यों, मीन तडफि मरि जाय । रसिक मधुप के मरण को, नहि समझत कमल सुझाव । दीपक को जो दया नही, समझत उडि उडि मरत पतग । मीराँ प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पानी मिलि गयो रंग ॥५२२॥† उपर्युक्त पद की प्रथम पंक्ति का निम्नांकित पाठान्तर प्राप्त है - “तू नागर नन्दकुमार, तों सो लाग्यो नेहरा ।” १४ गाव राग कल्याण, मोहन गावे राग कल्याण । आप गावे ने आप बजावे, मोरली सुँ मिलावे तान । मोर पछी सिर मुकुट-बिराजे, कुण्डल झलके कान । मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, गोपियें तजियो ध्यान । ॥५२३॥† १५ गौड़ी तो अब मिट गई, जब अस्त भयो है भाण । रात घटिका हो गई जब, प्रकट्यो राग कल्याण । कल्याण कल्याण सब को कहै, मै क्या कहूँ कल्याण । जा घेर सेवा श्याम की, ता घेर सदा कल्याण । अगो अंग की उलट भयो, जब प्रकट्यो राग कल्याण । कल्याण राग सो महाबली, सब राग को राखत मान । सिंघल देश की पद्मिनी, जपती राग कल्याण ॥५२४॥†

Page 341Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २९१ भाषा मे अर्थ-सगति नही है। उपर्युक्त पद मीराँ-विरचित है ऐसा भी कोई आभास पदाभिव्यक्ति से नही मिलता। पद स० ३, १४ और १५ इन तीनो ही पद मे राग कल्याण की व्युत्पत्ति का वर्णन या प्रशसा है।* पद स० ३ की भाषा पजाबी से प्रभावित है। पद स० २४ की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है और पद स० १५ की भाषा गुजराती से प्रभावित है। उपर्युक्त परिस्थिति मे ऐसे पदो को प्रक्षिप्त मानना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। गुजराती में प्राप्त पद १ वागे छे रे, वागे छे रे, पेला वनडा माँ, मीठी वेणु वागे छे दुरनो डर लागे छे। सासु सती माती सुख निद्रा माँ, जाऊँ तोरे ननदल जागे छे। ससुरो हमरो परम सुहागी, दियेरी वो छन छेनो दिल माँ दाझे छे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, जनम मरण भे भागे छे ।।५२५।।† २ अरे मोरली नन्दावन रागी, बागी छे जमनाने तीरे रे। मोरली ने नादे घेलाँ कीधाँ, मन काँई काँई कामण कीधाँ रे। जमनाने नीर तीर धेनु चरावे, काँधे काली काँबली रे। मोर मुगट पिताम्बर शोभे, मधुरी सी मोरली बजावे रे। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरणकमल बलिहारी रे ।।५२६।।† ३ चालो नी जोवा जइये रे, माँ मोरली वागी। भर निद्रा माँ हुँरे सुती ती, जब कि ने जोवा जागी॥ वृन्दावन ने मारग जाता, सामो मलियो सुहागी। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल लेहे लागी ।।५२७।।†

Page 342Permalink

२१२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ एक दिन मोरली बजाई, कन्हैया एक दिन मोरली बजाई। मोरली नाना दे मेरो मन हरि लीनो, ओम की सुरता उठाई। गौओ तो सब घास ना खाये, ............। शर्वरी तो बली स्तभ भई हे, चन्द्र गयो छुपाई रे। मेघ घटा घट थई रही छे, बादरी कारी गै वाही रे। मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल चित छाई रे। ॥५२८॥† ५ लीधाँ रे भटके, म्‍हाँरा मन लीधाँ रे लटके। गात्र रग कीधाँ गिरिधारिए, जो मार्या झटके। मन रे मारू मोरली मे मोह्युँ, पेला बाँस तणे कटके। मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, हो रग लाग्य अटके ॥५२९॥† ६ मोरलीए मोह्याँ मोहन, तारी मोरलीए मन मोह्याँ। थारे कारण शामलिया वाहला, गण भुवन मेणे जोया रे। थारा सरीखा प्रभु नव कोई दीठा, गण भुवन मनडे न मोह्याँ रे। मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्र प्रोयाँ रे ॥५३०॥† ७ मार्या छे मोहन बाण, वा'ली डे मार्या छे मोहना बाण। तमारी मोरलीए माराँ मनड़ाँ बिधायाँ, बिधायाँ, तन मन प्राण। वृन्दावन ने मारग जाताँ, हाँ रे मारो पालवडो मो ताण। जल जमना जल भरवा गयाँ ताँ, काँठले उभो पेलो काण। मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्त आण ॥५३१॥†

Page 343Permalink

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २९३ ८ वागे छे रे, वागे छे, वृन्दावन मुरली वागे छे, तेनो शब्द गगन मॉ गॉजे छे । वन्द्रा ते वन ने मारग जाता, वां'लो दान दधिना मॉगे छे । वन्द्रा ते वन मॉ रास रचायो छे, वां'लो रास मण्डल मॉ विराजे छे । पीला पीताम्बर जरकस जामा, वां'ला ने पीलो ते पटको विराजे छे । काने ते कुण्डल मुस्तके मुगट, हॉरे वां'ला मुख पर मुरली विराजे छे । वन्द्रा ते वन नी कुज गलिन मॉ, वां'ले थनक थई थई नाचे छे । बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वां'ला दरशन यो दुखड़ा भागे छे । ॥५३२॥†

Page 344Permalink

नाथ-प्रभाव् द्योतक पद राजस्थानी में प्राप्त पद १ जावा दे जावा दे, जोगी किस का मीत। सदा उदासी रहै मोरी सजनी, निपट अटपटी रीत। बोलत बचन मधुर से मानूँ, जोरत नाहि प्रीत। मैं जाणूँ या पार निभेगी, छोड़ि चले अधबीच। मीराँ के प्रभु स्याम मनोहर, प्रेम पियारा मीत ॥५३३॥ २ जोगिया जी छाइ रह्यो परदेस। जब का बिछुडिया फेर न मिलिया, बहोरि दियो न सदेस। या तन ऊपरि भसम रमाऊँ, खोर करूँ सिर केस। भगवाँ भेख धरूँ तुम कारण, ढूँढत च्यारूँ देस। मीराँ के प्रभु राम मिलण कूँ, जीवनि जनम अनेस ॥५३४॥ ३ जोगिया जी ' निसि दिन जोहाँ थॉरी बाट। पॉव न चालै, पथ दुहेलो, आडा ओघड घाट। नगर आई जोगी रम गया रे, मो मन प्रीत न पाइ। मैं भोली भोलापन किन्हो, राख्यो नही बिलमाइ। जोगिया कूँ जोवत बहूँ दिन बीता, अजहूँ आयो नाहि। बिरह बुझावण अन्तरि आवो, तपत लगी तन मॉहि। कै तो जोगी जग मे नाही, कैर बिसारी मोय।

Page 345Permalink

२९६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कॉई करूँ, कित जाऊँ सजनी, नैण गुमायो रोय। आरति तेरे अन्तरि मेरे, आवो अपनी जाणि। मीराँ व्याकुल विरहणी रे, तुम बिन तलफत प्राण ॥५३५॥ ४ पिय बिन सूनो छै जी म्हाँरो देस। ऐसा है कोई पिव कूँ मिलावै, तन मन करूँ सब पेस। तेरे कारण बन बन डोलूँ, कर जोगण को भेस। अवधि बदीति अजहूँ न आये, पडर होइ गया केस। मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, तजि दियो नगर नरेस ॥५३६॥ ५ जोगिया जी आवो थे या देस। नैणन देखूँ नाथ मेरो, ध्याय¹ करूँ आदेस। आया सावण मास सजनी, भरे जल थल ताल। रावल कुण बिलमाइ² राख्यो, बिरहिन है बेहाल। बिछडियाँ कोई भौं³ भयो रे, जोगी, ए दिन अहला४ जाइ। एक बेर देह फेरि, नगर हमारे आइ। वा सूरति मेरे मन बसे रे, जोगी छिन भर रह्यो न जाइ। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो हरि आइ ॥५३७॥ पाठान्तर १, जोगिया जी आजो इण देस। मै जास्या देखूँ नाथ नैं, धाइ करूँ आदेस। आया सावण भादवा, भरिया जल थल ताल। साँई कूँ बिलमाई राख्यो, ब्रहनी है बैहाल। १ दौडकर, २ फुसला रखना, ३ युग, ४ व्यर्थ।