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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ८७ की प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। अतः, कर्ता के साथ फल का सम्बन्ध बताना आवश्यक है और यह अधिकारी विधि के द्वारा होता है। विनियोग विधि क्रिया फल जनक होती है, इसी की अवगति कराती हुई प्रधानक्रिया के साथ अवान्तर क्रिया का अङ्गाङ्गिभाव या गुणप्रधानभाव को भी अवगत करती है। प्रयोग विधि अनेक अवान्तर अङ्गक्रियाओं का पूर्वापर भाव प्रदर्शन करती है। क्योंकि अङ्गक्रियाओं का एक साथ अनुष्ठान सम्भव नहीं है, अतः, इनमें क्रम आवश्यक है। इस विधि से उसी क्रम का प्रदर्शन होता है। इसीलिए इस विधि को अनुष्ठापन भी कहा जाता है। उत्पत्ति कहने से कर्म के स्वरूप का ज्ञान होता है, अतः, इन कर्म के स्वरूपों का ज्ञान जिस विधि से होता है—वहीं उत्पत्ति विधि है। पूर्वोक्त विधियों में सिद्ध वस्तु प्रतिपादक ब्रह्मविषयक ज्ञान का अन्तर्भाव सम्भव नहीं है। यदि यह कहा जाय कि कर्मविधि के प्रकरण में ये वाक्य नहीं कहे गये हैं, अर्थात् कर्मकाण्ड प्रकरण के मध्य में वेदान्त वाक्य नहीं कहे गये हैं, इसलिए भिन्न प्रकरण में पठित वाक्य के साथ एकवाक्यता सम्भव ही नहीं है। पूर्वपक्षी ने इसके समाधान में कहा है कि उपनिषद् में कथित उपासना विधि उपलब्ध है; और उसी प्रकरण में ब्रह्मबोधक वाक्य भी पठित है, अतः, उपासना विधि का यह शेष है। आचार्य शङ्कर ने अपने भाष्य में एवं उसकी व्याख्याओं में इसका विस्तृत विश्लेषण किया है। “तत्तु समन्वयात्”, (बा० सू० १।१।४) का भाष्य द्रष्टव्य है। अन्य प्रमाणों से अज्ञात ब्रह्म का ही प्रतिपादन उपनिषद् के उपक्रम, उपसंहार आदि वाक्यों से उपलब्ध है। 'तत्केन कं पश्येत्' आदि श्रुति वाक्यों से कारक और फल का निराकरण होने से कर्ता का भी निराकरण हो जाता है। 'अहं ब्रह्मास्मि' यह याज्ञिक भावना करने पर यज्ञ की सिद्धि सम्भव ही नहीं है। परिनिष्ठित ब्रह्म प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय नहीं है। अतः, लौकिक वाक्य घट, पट आदि सिद्ध वस्तु का प्रतिपादक होने से अनुवादक या सापेक्ष होने से अप्रमाण होने पर भी प्रकृत में यह दोष नहीं है। इसी प्रकार उपासना विधि शेष भी नहीं है, क्रिया कारक आदि द्वैतज्ञान का सर्वथा विलयन हो जाने से वह ब्रह्म किसी प्रकार भी उपास्य और उपासक नहीं हो सकता है। परिनिष्ठित वेद वाक्यों के अप्रामाण्य का प्रश्न भी नहीं है, क्योंकि, उपनिषद् से बोधित आत्मा और ब्रह्म का एकत्व विज्ञान भी सर्वदुःख निवृत्तिरूप मोक्ष का उत्पादक है, अतः ब्रह्म- प्रतिपादक वेदान्त के प्रामाण्य का प्रत्याख्यान उचित नहीं है। क्योंकि वेद का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है। वेद ही ब्रह्म विषय में प्रमाण है अर्थात् ब्रह्म ही वेदानुशास्त्र का प्रतिपाद्य है। 'तत्तु समन्वयात्' सूत्र में अनेक भाष्य हैं। आचार्य शंकर के मत का दिग्दर्शन मात्र किया है। उपासना परक सिद्धान्त में समन्वय की भिन्न प्रक्रिया है। इस विषय की वहीं से अवगति करे ॥ ७ ॥