मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ९५ करते तब इन अर्थवादों से रोदन, अपनी वपा का छेदन, दिङ्मोह, स्तेय या मिथ्या- वादन आदि कर्तव्य के रूप में बोधित होते । तभी पूर्वपक्षी के द्वारा कथित दोष सङ्गत होता और शास्त्रदृष्टविरोध का कथन सङ्गत होता । किन्तु रोदन आदि अर्थवाद के शब्दों का अर्थ मात्र होता है । इस प्रकार अर्थवाद के अर्थ अविवक्षित हैं, क्योंकि, अर्थवाद स्वार्थ में तात्पर्य रहित है । इसलिए, जिस रूप में अर्थवाद वाक्यों की सप्रयोजनता का निर्देश पूर्वक प्रामाण्य का स्थापन किया है—वह सर्वथा युक्तियुक्त ही है । अर्थवाद वाक्यों का तात्पर्य-निरूपण किया जा रहा है । 'अप्राप्ता'=प्राप्त नहीं, 'च' और, "अनुपत्ति" शास्त्रदृष्टविरोधरूप युक्तिहीनता, "प्रयोगे" क्रिया का विधायक होने पर, "शब्दार्थः" शब्द का स्वार्थ, 'तु' किन्तु, 'अप्रयोगाभूत'' क्रिया का विधायक नहीं है, "तस्मात्" इसलिए, "उपपद्यते" युक्तियुक्त होता है । अर्थवाद वाक्यों का जिस रूप में अर्थ का निर्देश किया गया है, उससे मेरे पक्ष में किसी प्रकार युक्ति का विरोध सिद्ध नहीं हो रहा है । क्योंकि, अर्थवाद यदि अपने अर्थभूत क्रिया का प्रतिपादक होता, तब विरोध होता, किन्तु, अर्थवाद स्वार्थ- बोधित क्रिया का प्रतिपादक नहीं है, अतः, जिस रूप में उनकी सप्रयोजनता से प्रामाण्य का निर्देश किया गया है, वह उपपन्न होता है ॥ ९ ॥ गुणवादस्तु ॥१.२.१०॥ शा० भा०--यदुक्तं विधेयस्य प्ररोचनार्था स्तुतिरिति । तदिह कथमवकल्प्येत यत्रान्यद्विधेयमन्यच्च स्तूयते । यथा वेतसशाखायाऽवकाभिश्चाग्निं विकर्षतीति वेतसावके विधीयेते । आपश्च स्तूयन्ते-आपो वै शान्ता इति । तदुच्यते । गुणवादस्तु । गौण एष वादो भवति, यत्संबन्धिनि स्तोतव्ये संबन्ध्वन्तरं स्तूयते । अभिजनो ह्येष वेतसावकयोः । ततस्ते जाते । अभिजनसंस्तवेन चाभिजातः स्तुतो भवति । यथाऽश्मकाभिजनो देवदत्तोऽश्मकेषु स्तूयमानेषु स्तुतमात्मानं मन्यते । एवमत्रापि द्रष्टव्यम् । अथ सोऽरोदीदिति कस्य विधेः शेषः । तस्माद् बर्हिषि रजतं न देयमित्यस्य । कुतः। साकाङ्क्षत्वात्पदानाम् । सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमित्यत्र स इति प्रकृतापेक्षः । तत्प्रत्ययात् । तस्य यदश्रुवशार्यंतेति तस्येति पूर्वप्रकृतापेक्ष एव । उपपत्तिश्चोपरितनस्य, यो बर्हिषि रजतं दद्यात्पुराऽस्य संवत्सराद् गृहे रोदनं भवतीति । अस्य हेतुत्वेनायं प्रतिनिर्दिश्यते- 'तस्माद्बर्हिषि रजतं न देयमिति' । एवं सर्वाणि साकाङ्क्षाणि कथं विधेरुपकुर्वन्तीति ? गुणवादेन । रोदनप्रभवं रजतं वर्हिषि ददतो रोदनमापद्यते । तत्प्रतिषेधस्य गुणो यदरोदनमिति । कथं पुनरुदत्यरोदीदिति भवति, कथं वाऽनश्रुप्रभवे रजतेऽश्रुप्रभवमिति वचनम्,