मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १०९ परम्परा क्रम से निवास कर रहा है, यह जानकर उसके सम्बन्ध में कुछ कहने के उद्देश्य से यदि काञ्ची देश की प्रशंसा करता है, तब उस देश की प्रशंसा से उस व्यक्ति के द्वारा उसकी ही प्रशंसा अवगत होती है, वैसे ही इस स्थल में भी जल का शान्तत्व कथन जल में उत्पन्न वेतस शाखा की ही प्रशंसा की गई है। वेतस एवं अवका शान्त स्वभाव जल से उत्पन्न होने से स्वयं शान्त स्वभाव है, इसीलिए वह यजमान के भी अनिष्ट की शान्ति करने में समर्थ हैं—यही प्रकृत में अर्थवाद का तात्पर्य है। इसी प्रकार “बर्हिषि रजतं न देयम्” (तै० सं० १।५।१।२) इस वाक्य में बर्हि नामक यज्ञ में रजत के दान का निषेध किया गया है, इसी के बाद “सोऽरोदीत् यद- रोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् । तस्य यदश्रु शीर्यन्ते” इत्यादि अर्थवाद में कहा गया है कि उसने (रुद्र ने) रोदन किया, यही रुद्र का रुद्रत्व है, अर्थात् इसीलिए वह रुद्र है, रोदन काल में जो अश्रुपात हुआ; वही रजत है। इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति बर्हिः याग में रजत दक्षिणा के रूप में देता है उसके घर पर वर्ष के भीतर ही ऐसा अनिष्ट होता है, जिससे निश्चित रूप में उसको रोदन करना पड़ता है। इस प्रकार इसके द्वारा रजत के दान की निन्दा कर रजत को दक्षिणा के रूप में न देने की प्रशंसा की गई है। “यः प्रजायाकामः यः पशुकामः स्यात् स एतं प्राजापत्यमजं तूपरमालभेत”, (तै० सं० २।१।१।४,५) यह विधिवाक्य कहा गया है “प्रजाकामी एवं पशुकामी व्यक्ति प्रजा- पति देवता के उद्देश्य से तूपर अर्थात् शृङ्गहीन छाग के द्वारा यज्ञ करे”। इसी के बाद श्रुति में कहा गया है—“प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्”। इससे पूर्व में पशु नहीं था, अतः प्रजापति ने पशु के स्थानपर हृदय के मेदा को काटकर अग्नि में आहुति की और इस कर्म का ऐसा सामर्थ्य है कि अग्नि में पशु की वपा की जगह पर अपने वपा की आहुति देने के साथ ही साथ तूपर अज एवं अन्य पशु भी उत्पन्न हुए। यह घटना सत्य हो या असत्य इससे कुछ होना नहीं है। क्योंकि, अत्यन्त काल्पनिक वस्तु के द्वारा भी प्रशंसा या निन्दा करना आज भी लोक व्यवहार में प्रसिद्ध है। प्रकृत में इसके द्वारा यहो कहा गया है कि कर्म शीघ्र फल देता है, अथवा इसका यह तात्पर्य है कि विशिष्ट प्रयोजन की सिद्धि के लिए जब अपनी वपा का छेदनकर भी कर्म का अनुष्ठान किया गया तब धन आदि बाह्य पदार्थों के व्यय से तो वह कर्तव्य ही है। लोकव्यवहार में भी ऐसा कहा जाता है कि जीवन विसर्जन कर भी मानमर्यादा की रक्षा करूँगा तब रुपये पैसे की क्या बात है, प्रकृत में भी यही समझना चाहिए। इसी प्रकार “आदित्यः प्रायणीयश्चरुः” (तै० सं० ६।१।५।१) इत्यादि में आदित्य देवता के उद्देश्य से जो प्रायणीय आदि नामक यज्ञ के चरु का विधान किया गया है, उसी के साथ “देवा वै देवयजनकाले दिशो न प्रजानन्” यह श्रुति कही गई है। देवताओं को भी देवयज्ञ करते समय दिङ्मोह हुआ था, किन्तु, अदिति देवता के सामर्थ्य से उन देवताओं का मोह दूर हो गया, अतः, सोमयाग अनेक कर्मकलापों का सङ्कुल है। इसलिए