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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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४१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २३१ तो पूर्णिका नाम की नारी यज्ञ के लिए अवहनन कर रही है और न ब्रह्मचारी ही यज्ञ के लिए मन्त्रपाठ कर रहा है । किन्तु काकतालीयन्याय से स्वाभाविक रूप में दोनों की एक कालीनता है । यही कारण है कि माणवक के द्वारा पढ़ा गया अवघात मन्त्र वहाँ अर्थ का प्रकाशक नहीं है । किन्तु यज्ञ का मन्त्रपाठ वाचनिक अर्थात् शास्त्रवचन से सिद्ध है और उन दोनों में वैसा वाचनिक या वैध सम्बन्ध रहता है । इसलिए इस स्थल में स्वतः प्राप्त अर्थ का प्रकाश निवारण के योग्य नहीं है । अथवा स्वाध्याय विधि स्थल के समान यहाँ भी विद्या-अवचन विद्या अर्थात् अर्थज्ञान का अवचन अर्थात् अविधान असंयोगात् अर्थात् अर्थ सिद्ध होने से दोष नहीं है । आशय यह है कि स्वाध्यायविधि स्थल में जैसे अर्थ का ज्ञान विधि से बोधित नहीं है, क्योंकि वह अर्थ सिद्ध है वैसे ही मन्त्र के उच्चारण स्थल में मी अनुष्ठेय अर्थ का प्रकाशन अर्थ सिद्ध है । क्योंकि स्वाध्याय वेद के अध्ययन से सभी मन्त्र पढ़ने योग्य एवं उनका अर्थबोध मी स्वारसिक है ॥ ४० ॥ सतः परमविज्ञानम् ॥ १.२.४१ ॥ शा० भा०—विद्यमानोऽप्यर्थः प्रमादालस्यादिभिर्नोपलभ्यते । निगमनिरुक्त- व्याकरणवशेन धातुतोऽर्थः कल्पयितव्यः । यथा सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू इत्येव- मादीन्यश्विनोरभिधानानि द्विवचनान्तानि लक्ष्यन्ते । अनेन 'अश्विनोः काममप्रा' इत्याश्विनं सूक्तमवगम्यते । देवताभिधानानि च घटन्ते जर्भरीत्येवमादीनि । अवयवप्रसिद्ध्या च लौकिकेनाथेन विशेष्यन्ते । एवं सर्वत्र ॥ ४१ ॥ भा० वि०—अविज्ञानादित्युक्तमनुभाष्यं दूषयति—सत इति । तत्र पर इत्यनुवादभागं व्याचष्टे—यत्त्विति । न ज्ञायत इत्यस्मादूर्ध्वमिति परं कारण- मुक्तम्, तदयुक्तमिति वाक्यं पूरणीयम्, सतो विज्ञानमिति सूत्रावयवं व्याचष्टे— विद्यमानोऽपीति । नोपलभ्येतेति शेषः । अतो नानुपलब्धिमात्रेणासत्त्वमिति भावः । ननु लोके तेनाप्यप्रयुक्तपूर्वपदार्थस्य कथं सत्त्वावधारणमत आह—निगमेति । उपलक्षणमेतत् अर्थप्रकरणार्षसूक्तदेवतावशेन चेति द्रष्टव्यम्, तत्र तावत् सृण्येवेति मन्त्रस्य सूक्तार्न्तर्गतत्वेन सूक्तदेवताविषयत्वं दर्शयितुं सूक्तदेवतां तावद्दर्शयति— यथेति । कुत इत्यत आह—द्विवचनेति । ननु द्विवचनान्ततया द्वित्वाभिधायित्वेऽपि कथमश्विनोरभिधानं मित्रावरु- णाद्यभिधानोपपत्तेरत आह—अनेनेति । अश्विनोः काममप्रा इत्यन्ते प्रत्यक्षात् सङ्कीर्तनात् अश्विनामित्येव सूक्तं निश्चीयत इत्यर्थः । ननूक्तदेवतापरत्वेऽपि मन्त्रस्य कथं तदभिधानसामर्थ्यं पदानामत आह— देवतेति । जर्भरी तुर्फरीतू इत्येवमादीति प्रकृतिप्रत्ययरूपार्थप्रसिद्धथैवेति निग-