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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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४४ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २३९ आशय यह है कि पूर्वंकथित सूत्रों में यह आपत्ति दी गई है किन्तु प्रकृत में सिद्धान्त के अनुकूल युक्तियों का प्रदर्शन किया जा रहा है—लिङ्गोपदेशः इत्यादि। मन्त्र विव- क्षित अर्थ को कहने वाले हैं, क्योंकि, स्थल-स्थल में मन्त्र के अर्थ का उल्लेख कर कर्म की विधि कही गई है। जैसे "आग्नेय्या आग्नीध्रमुपतिष्ठते", आग्नेयी ऋचा के द्वारा आग्नीध्र अर्थात् आग्नीध्र का जो स्थान उसका उपस्थान = संस्कार या पूजा करनी चाहिए—इस प्रकार की एक विधि है, इस स्थल में "अग्ने नय" आदि मन्त्र से उप- स्थान करें—यह न कह कर आग्नेयी ऋचा के द्वारा करें—यह कहा गया है। अग्नि जिसका देवता है वही आग्नेयी ऋक् है। इस मन्त्र में अग्नि का ही विषय प्रधान रूप से वर्णित है या नहीं यह अवगत नहीं होता है, इसलिए, यह कहना पड़ेगा कि मन्त्र का अर्थ विवक्षित है। अतः मन्त्र अनर्थक नहीं है, अपितु विवक्षित अर्थ को कहने वाले हैं—"आग्नेय्या अग्नीध्रमुपतिष्ठते" इत्यादि विधि ही इसका लिङ्ग .या ज्ञापक है। ।। ४३ ।। ऊहः ।। १.२.४४ ।। शा० भा०—ऊहदर्शनं च विवक्षितार्थानामेव भवति । किमूहदर्शनम् ? 'न पिता वर्धते न मातेति । अन्ये वर्धन्त इति गम्यते । प्रत्यक्षं कौमारयौवनस्था- विरैर्वर्धन्ते मात्रादयः । शब्दो न वर्धत इति ब्रूते । का पुनः शब्दस्य वृद्धिः ? यद्विवचनबहुवचनसंयोगः ॥ ४४ ॥ भा० वि०—ऊह इत्येतत्पूर्वसूत्राच्चशब्दमर्थवच्छब्दं चादाय व्याचष्टे— ऊहदर्शनं चेति । ननूहः कार्यं इति वचनादर्शनात् किमूहदर्शनमिति पृच्छति—किमिति, ऊह- प्रतिषेधकवाक्यस्य प्राप्तिमन्तरेणायोगात् मात्रादिविशेषोपादानेन शब्दान्तरे प्रतीतेश्चास्त्येवोहदर्शनमित्याह—न मातेति । ननु मात्रार्थस्यैव वृद्धिप्रतिषेधात् कथं शब्दान्तरोहप्रापकत्वं तत्राह— प्रत्यक्षमिति । अर्थवृद्धेः प्रत्यक्षत्वेन प्रतिषेद्धुमशक्यत्वाच्छब्दवृद्धेरेव प्रतिषेध इत्यर्थः । ननु वर्णेषु स्थौल्यादेरसम्भवात् कथं वृद्धिरिति पृच्छति—का पुनरिति । उत्तरं—यद्विवचनेति । अर्थाधिक्येन द्विवचनादिसंयोग एव वृद्धिः, न पुनः स्थो- ल्यादिरिति भावः ॥ ४४ ॥ त० वा०—ऊहदर्शनं 'न माता वर्धत' इति । अर्थे च पुष्ट्यादिवृद्धेः प्रत्यक्षत्वात्प्रतिषेधासंभवादानर्थक्यात्तदङ्गेष्विति शब्दे विज्ञायते । तत्रापि स्थौल्यादिवृद्ध्यसंभवादधिकार्थवाचित्वेन द्विवचनबहुवचनयोः प्रतिषेधः । स