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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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२ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १७२ वेद का प्रामाण्य स्वीकार करने वाला व्यक्ति शिष्ट कहा जाता है। वे ही शिष्टगण जब वेदोक्त कर्मों के समान एक ही तरह की श्रद्धा और विश्वास के साथ स्मृति विहित कर्मों का भी अनुष्ठान करते हैं, तब स्मृति का प्रामाण्य नहीं है—यह नहीं कहा जा सकता है। परम आस्तिक वेदप्रामाण्यवादी सर्वज्ञकल्प मनु आदि त्रैवर्णिक महर्षियों ने जब उसका संग्रह किया है एवं मनु आदि के समान सर्वज्ञ सदृश महर्षियों ने भी जब वेद- वाक्यों के समान ही सभी स्मृति वचनों का भी प्रामाण्य माना है, तब इन सभी शिष्टों से परिगृहीत स्मृतियों का भी प्रामाण्य अवश्य ही मानना होगा। इन स्मृति वचनों का मूलभूत वेद वचनों के न रहने पर जब स्मृति नहीं हो सकती है, तब अर्थापत्ति के द्वारा वेदवचन का अनुमान हो सकता है। इसलिए सूत्र में स्मृति को अनुमान शब्द से कहा गया है। अनुमान जैसे प्रत्यक्ष मूलक है वैसे ही स्मृति भी प्रत्यक्ष सदृश वेदवचन मूलक है। शास्त्र मत में उपलभ्यमान वेदवचन प्रत्यक्षपद से वाच्य है, क्योंकि, जो प्रत्यक्ष के समान ही निःसन्दिग्ध रूप में अलौकिक अर्थ को विज्ञापित करता है वह स्मृतिवचन अनुमान स्थानीय है, कारण जैसे अनुमान प्रत्यक्षका आश्रयण कर पदार्थ विषयक ज्ञान को उत्पन्न कराता है, वैसे ही स्मृति भी वेदवचन का आश्रयण कर अलौकिक धर्म और अधर्म के विषय में अनुभव उत्पन्न कराती है। यदि यह कहा जाय कि ऐसा मानने पर उसके मूलाधार भूत वेदवचन भी स्मृत होगा, अन्यथा वह वन्ध्य नारी के दौहित्र के घर के स्मरण के समान अप्रमाण होगा। इसके उत्तर में कहा गया है कि वेद की अनेक शाखाएँ थीं, जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं, उन शाखाओं में अवस्थित होने से स्मृति का मूलाधार वचन उपलब्ध नहीं है। वार्तिक- कार कुमारिल ने कहा कि उत्सन्नवाद को स्वीकार करना उचित नहीं है। अनुसन्धान करने पर स्मृतिवचनों का मूलाधार श्रुतिवचन दुर्लभ नहीं है। उस प्रसङ्ग में यह भी कहा जा सकता है कि श्रुतिवाक्य हैं तो स्मृतिवाक्य निरर्थक हैं। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, कारण, वेद की एक-एक शाखा विभिन्न सम्प्रदायों में आबद्ध है। उन सम्प्रदायों की गुरुशिष्य-परम्परा ने उन शाखाओं को अक्षुण्ण रूप में धारण किया है, अतः, अपनी शाखा के समान दूसरी शाखा में आस्था-स्थापन करने पर साङ्कर्य्य होने से सम्प्रदाय का ही विनाश हो जायगा। इसलिए शाखाओं में अनेक शाखाओं के ग्रहण का आदर एक सम्प्रदाय को नहीं है। अपि तु ऐसा होने पर भी अन्य शाखाओं में स्थित सर्व- साधारण के लिए अवश्य अनुष्ठेय कर्मों की उपेक्षा नहीं की गई है इसलिए मनु आदि सर्वज्ञ महर्षियों ने सभी कर्मों का सभी शाखाओं में कथन न होने से एवं सभी के लिए वे अवश्य अनुष्ठान के योग्य भी हैं, अतः समो कर्मों को सभी शाखाओं से सङ्कलन कर स्मृति के रूप में निबद्ध कर दिया है। स्मृति का पाठ श्रुति के अध्ययन के समान विशेष नियमबद्ध न होने से उसके साथ श्रुति का साङ्कर्य्य सम्भव नहीं है। एक शाखा विशेष के सम्प्रदायबद्ध व्यक्ति साधारणतः अन्य शाखाओं का अध्ययन नहीं करते हैं अतः स्मृति का मूलभूत वहाँ के वेदवचनों को वे नहीं जान पाते हैं। इसलिए, यह