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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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Page 454

४०२ मीमांसादर्शनम् [ सू० अहिंसा, दान आदि वेद से उपदिष्ट होने पर भी बौद्धों के संस्पर्श से सुराभाण्ड में स्थित गङ्गाजल के समान हैं, कुत्ते के चमड़े से बनायी गई दृति (किस्ति) में रखे गये गोदुग्ध के समान वह अपवित्र हो जाने से उनकी स्मृतियों से वे ज्ञातव्य होने पर धर्म नहीं होंगे। अपितु वेद में उल्लिखित महर्षियों के ग्रन्थों से ही धर्म होता है—इसीलिए आचार्य कुमारिल भट्ट ने कहा है— “वेदेनैवाभ्यनुज्ञाता येषामेव प्रवक्तृता । नित्यानामभिधेयानां मन्वन्तरयुगादिषु ॥ तेषां विपरिवर्तेषु कुर्वतां धर्मसंहिताः । वचनानि प्रमाणानि नान्येषामिति निश्चयः ॥” वेदोक्त अहिंसा आदि और बुद्धोपदिष्ट अहिंसा आदि समान नहीं है, क्योंकि उनके मत में हिंसात्व अवच्छेद में हिंसा वर्जित होने से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ में भी हिंसा परित्याज्य होगी, किन्तु, इस पक्ष में वेद विधि रूप में विहित हिंसा में पाप नहीं है, अपि तु वेदविधि के अविषयत्व एवं वेद निषिद्धत्व रूप में हिंसा पाप है। ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ में हिंसा वेदविहित होने से वह अवश्य अनुष्ठेय है, किन्तु उनकी स्मृति के अनुसार अहिंसा अवलम्बनीय होने से ज्योतिष्टोमादि यज्ञ के स्थल में भी हिंसा का परित्याग करना होगा। सन्देह नहीं कि आज बौद्ध धर्मों में अतिशय अनुराग होने से विहित स्थल में भी हिंसा के वर्णन का विपुल प्रयास चल रहा है साथ ही अमेध्य मांस भक्षण की प्रवृत्ति भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। धन्य है धर्म और अन्धानुराग-परम्परा एक ओर हिंसा का विरोध और दूसरी ओर हिंसाजन्य उपलब्ध मांस भक्षण की अतिशय प्रवृत्ति । इसीलिए वार्त्तिककार ने कहा है— शोभासोक्त्यं-हेतूक्तिकलिकालवशेन वा । यज्ञोक्तपशुहिंसादित्यागभ्रान्तिमवाप्नुयुः ॥ वेदादिशास्त्रों में ब्राह्मण से भिन्न को विधिपूर्वक सम्प्रदान निषिद्ध है, किन्तु बौद्धादिस्मृतियों में इसे ही प्रशंसनीय विषय के रूप में स्वीकार किया गया है। शम, दम आदि के सम्बन्ध में भी यही रीति अपनानी चाहिए। अतः वेद बहिर्भूत बौद्धादि- स्मृति प्रमाण नहीं है। “अपि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन्” इस सूत्र की व्याख्या में वार्त्तिककार ने शिष्टाचार का प्रामाण्य प्रतिष्ठापित किया है। होलाक (होली का उत्सव) आदि कर्म जो प्रत्यक्ष श्रुति से विहित नहीं हैं एवं स्मृतिकारों ने उन्हें निबद्ध नहीं किया है, किन्तु शिष्ट = वेदप्रामाण्यवादियों ने इनका अनुष्ठान किया है। अतः यह विचारणीय है कि ये शिष्टाचार प्रमाण है या नहीं ? इस सन्देह में यदि यह कहा जाय कि (पूर्वपक्ष के रूप में) शिष्टाचार संख्याबद्ध एवं व्यवस्थित प्रमाण नहीं है, साथ ही अनेक शिष्टों ने भी बहुत