मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
Page 505 of 804
Read in context१० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४५१ यद्वृत्तिकारेणोदाहरणं दत्तं तदनादृत्य इत्यन्वयः। अत्यन्तासिद्धस्याध्यारोपेण कल्प- सूत्रकाराणामभिभवः कार्यं इत्यभिप्रायेण युक्तत्वादिति हेतुः। किमत्यन्ताभूतमध्यारो- पितमित्यपेक्षायां दर्शोत्युक्तं दर्शपूर्णमासयोश्चरकं गमकं तद्विषयं कल्पसूत्रकारवचनं चेत्यसदे- वाध्यारोपितमित्यर्थः। नन्वमावास्यापौर्णमासीशब्दयोर्दर्शनात् कथं तद्विषयस्यासत्त्वमित्या- शङ्क्य-पार्वणेत्युक्तम्। गृह्यकारवचनत्वेन श्रवणादित तद्विषयत्वे हेतुः। गृह्यशब्दस्योपास- नाग्न्यधिकरणकर्मविषयत्वेन तत्प्रतिपादनाधिकृतानां वैतानिककर्मप्रतिपादनस्यानुचितत्वा- दिति भावः। एतदेव दृष्टान्तेनोपपादयति—गृह्येति। प्रदोषान्तो होमकालः, सङ्गवान्तः प्रातः तमतिनीय चतुर्गृहीतमाज्यं जुहुयादित्यग्निहोत्रस्य स्वकालातिक्रमे प्रायश्चित्तस्मरणाद- पस्मृतेस्तद्विषयत्वाभावनिश्चयाद् दृष्टान्तत्वम्। गृह्यकारवचनत्वेन स्वयंदृष्टत्वाद्भाष्यकारो- दाहृतसमानविषयमुदाहरणान्तरमुक्तम्। किं तर्ह्यत्रोदाहरणमित्यपेक्षायामाह--तस्मादिति। सर्वाणि हवींषि पर्यग्निकरोतीति कल्पसूत्रकारैः पर्यग्निकरणस्य सर्वत्र हविःषु प्रयुक्त- त्वात्तद्विरुद्धस्य च पुरोडाशं पर्यग्निकरोतीति शास्त्रस्य सन्निधानादित्येवं व्याख्येय- मित्यर्थः॥ १० ॥ ॥ इति षष्ठं कल्पसूत्राधिकरणम् ॥ मा० प्र०—म्लेच्छों की प्रसिद्धि से आर्यों की प्रसिद्धि बलवती है—यह पूर्व सूत्र के व्याख्यान से सिद्ध है। प्रस्तुत प्रसङ्ग में यह आशङ्का होती है कि वेद आदि में पिक, तामरस, नेम, क्लोम, आदि का किसी विशेष अर्थ में प्रयोग प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु म्लेच्छों ने क्रमशः कोकिल, पद्म, अर्द्ध, देह के अभ्यन्तर स्थित अवयव विशेष में प्रयोग किया है। म्लेच्छों के द्वारा स्वीकृत इन अर्थों का ग्रहण करना उचित है या नहीं ? पूर्वपक्षियों का कहना है कि पूर्व अधिकरण में म्लेच्छों की प्रसिद्धि को अशास्त्रीय माना गया है, अतः उनकी प्रसिद्धि अनादरणीय है, इसलिए प्रदर्शित अर्थ ग्राह्य नहीं हैं। इसके समाधान में सिद्धान्ती ने कहा है कि आर्यों की प्रसिद्धि के साथ म्लेच्छों का विरोध रहने पर पूर्वोक्त नियम स्वीकार किया गया है। किन्तु, प्रकृत में आर्यों की इन शब्दों के अर्थों की प्रसिद्धि नहीं है, अतः म्लेच्छों की प्रसिद्धि ही आदरणीय है। निरुक्त आदि में इन शब्दों के अन्य अर्थों की कल्पना उचित नहीं है, क्योंकि (१) यौगिक अर्थ की अपेक्षा रूढ़ अर्थात् प्रसिद्ध अर्थ बलवान् होता है। (२) निरुक्त के द्वारा एक ही शब्द के अनेक अर्थों की कल्पना की जा सकती है, ऐसी स्थिति में कौन अर्थ ग्राह्य है, कौन अर्थ ग्राह्य नहीं है—इसकी व्यवस्था सम्भव नहीं है। (३) पशु-पक्षी आदि के पालने में, वृक्ष, पुष्प आदि की वृद्धि में, पशुओं के छेदन-भेदन आदि कार्यों में आर्यों की अपेक्षा म्लेच्छ अधिक पटु हैं, अतः, इन विषयों में उनको ही अभियुक्त मानना होगा, फलतः, पिक, तामरस आदि वैदिक शब्दों का अर्थ उन लोगों की प्रसिद्धि के अनुसार ही मानना होगा। अर्थ प्रसिद्धि के साथ विरोध न होने से इन स्थलों में म्लेच्छों की