मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
Page 520 of 804
Read in context४६६ मीमांसादर्शनम् [ सू० उत्तरसूत्रसङ्गत्यर्थमपि उपपदनिरासार्थंतयैवायं ग्रन्थो व्याख्येय इत्याह—तद्यथा चेति । तन्न्यायत्वादिति सूत्रावयवव्याख्यानाथं तस्मादिति भाष्यम् । सर्वधर्मत्वस्यैव साध्य- त्वाद्धेतुत्वानुपपत्तेरयुक्तमाशङ्क्य सर्वधर्मत्वसाधकसर्वाधिकारन्यायत्वादित्येवं व्याचक्षाणः सर्वधर्मत्वप्रतिज्ञायां योजयति--तस्मादिति ॥ ११ ॥ मा० प्र०—कल्पसूत्र आदि स्वतः प्रमाण है या नहीं अर्थात् ये भी अपौरुषेय हैं, या नहीं ? यज्ञ की पद्धतियाँ यज्ञों के प्रयोग-कौशल बोधक कल्पित करने वाले शास्त्र कल्प कहे जाते हैं। संज्ञा और परिभाषा के द्वारा यज्ञों के प्रयोग के सूचक-सूत्र कहे जाते हैं,—कल्प और सूत्र कल्पसूत्र है । यह सत्य है कि श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र को कल्पसूत्र कहा जाता है, किन्तु, प्रकृत में श्रौतसूत्र के अर्थ में कल्पसूत्र कहा गया है। जिस ग्रन्थ में प्रत्यक्ष वेद विधि से बोधित यज्ञ आदि कर्मों की परिपाटी उपदिष्ट होती है—उसको श्रौतसूत्र कहा जाता है । जिसमें अप्रत्यक्ष वेदविधि बोधित अर्थात् वेदमन्त्र आदि के द्वारा अनुमित विधियों के द्वारा बोधित संस्कार आदि कर्मों के प्रयोगों का विवरण रहता है—उसको गृह्यसूत्र कहा जाता है, इससे भिन्न क्रियाप्रतिपादक शास्त्र धर्मसूत्र है। इसी विवरण के अनुसार श्रौतसूत्रों में कथित कर्मों को श्रौत कर्म और इनसे भिन्न कर्मों को स्मार्त्त कर्म कहा जाता है। कात्यायन, आश्वलायन, शट्चायन आदि कल्पसूत्र हैं, इनका वेद के समान ही स्वतन्त्र रूप में प्रमाण है, क्योंकि, वेद को देखे विना ही याज्ञिक केवल कल्पसूत्रों की सहायता से यज्ञादि कर्मों का सम्पादन करते हैं। किन्तु, कल्पसूत्रों को छोड़कर केवल मन्त्र एवं ब्राह्मण के द्वारा यज्ञकर्मों का सम्पादन नहीं किया जा सकता है। 'षडङ्गमेके' इस प्रसिद्धि के अनुसार कल्पसूत्र को वेद कहा जाता है। इसीलिए कल्पसूत्र प्रयोग शास्त्र मी वेद के समान अपौरुषेय एवं अपौरुषेय होने से स्वतन्त्ररूप में प्रमाण है । 'प्रयोगशास्त्रम्'—कल्पसूत्र आदि यज्ञप्रयोग शास्त्र स्वतन्त्र रूप में ही प्रमाण अर्थात् अपौरुषेय हैं, 'इति चेत्'—यदि यह कहा जाय । कतिपय व्यक्ति पूर्वपक्ष कर सकते हैं कि कल्पसूत्र आदि यज्ञप्रयोग शास्त्र अपौरुषेय हैं। यह पूर्वपक्ष है ॥ ११ ॥ नासन्नियमात् १ ॥ १२ ॥ सि० शा० भा०—नैतदेवम् । असन्नियमात् । नैतत्सम्यङ्निबन्धनम् । स्वराभा- वात् ॥ १२ ॥ सिद्धान्तः ॥ १. क. संनियमादिति ।