मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४७९ नन्वेवं सति नित्यशब्दाभिधेयस्य नियमलक्षणसम्बन्धस्यापि लिङ्गनक्रियासिद्ध्युप- योगित्वेन तत्कारकतया लिङ्गेनैव नित्यमपेक्षणात्तत्सापेक्षत्वेऽपि सामर्थ्यविघातः स्यादित्या- शङ्क्याह—नित्यत्वं पुनरिति । नियमाधीनत्वेऽपि लिङ्गनक्रियायास्तदधीननिरूपणत्वा- भावान्नित्यत्वनिरपेक्षेणैव लिङ्गशब्देन स्वार्थे लिङ्गलब्धे लिङ्गत्वस्य नियतत्वं विनाऽनुप- पत्तेरर्थेन स्वसिद्धयर्थं नित्यत्वमपेक्षितम्, न शब्देनेत्यर्थः । लब्धेन स्वार्थेन लिङ्गेना- पेक्षितमिति विग्रहः । नन्वेवं र्तहि शब्दस्य नैरपेक्ष्यात्सामर्थ्यस्याविघातः स्यादित्या- शङ्क्याह—तद्धर्मतयेति । विगृहीतया षष्ठ्या लिङ्गधर्मतया नित्यत्वं लिङ्गस्य समर्थ्यते, लिङ्गेनान्वीयते इत्यन्वयसिद्धयर्थं लिङ्गस्य नित्यत्वे—सम्बन्धापेक्षायामित्युक्तम् । तस्मा- द्भाष्यकृतोऽपि कर्तृविशेषणम्, अधिकारिविशेषणं वा नित्यशब्दोऽभिमतो, न लिङ्गविशे- षणमित्याह—तस्मादिति । उभयत्रापि सूत्रं योजयति—नियतस्येति । तस्मादित्यप- संहारभाष्यं व्याचष्टे—इतीति ॥ १३ ॥ भा० प्र०—कल्पसूत्रों के अपौरुषेय न होने का कारण निर्देश करते हुए द्वितीय सूत्र की अवतारणा की गई है। कल्पसूत्र अपौरुषेय नहीं है, क्योंकि वेद में विधिवाक्य रहने पर उनकी निन्दा और स्तुति के सूचक वाक्यशेष अर्थात् अर्थवाद वाक्य उपलब्ध होते हैं, किन्तु, कल्पसूत्रों में विधिवाक्य रहने पर भी, उनके कोई अर्थवाद वाक्य उपलब्ध नहीं होते हैं। कल्पसूत्रों में "आर्षेयान् यूनोऽनूचानाम् ऋत्विजो वृणीते सोमेन यक्ष्यमाणः" (शाङ्खायन श्रौ० सू० ५।१।१) 'वृता यजन्ति', "अथोत्तरं देवयजनमध्यवस्यन्ति" (शा० श्रौ० सू० १५।१४।१) इत्यादि विधिवाक्यों में विधि के बोधक लिङ्लकार का प्रयोग न होकर, क्रिया के बोधक लट्लकार का प्रयोग उपलब्ध हो रहा है। प्रकृत में लट्लकार का प्रयोग है और विधि की स्तुति करने वाला वाक्यशेष भी नहीं है। अतः, कल्पसूत्र अपौरुषेय नहीं है, अतः वेद के समान इनका प्रामाण्य नहीं है। यदि यह कहा जाय कि वेद में जिस प्रकार "यजति" आदि विधिबोधक लेट्लकार का प्रयोग है, वैसे ही प्रकृत में भी विधिबोधक पञ्चम लेट्लकार का प्रयोग है, किन्तु यह नहीं माना जा सकता है, क्योंकि, केवल संहिता और ब्राह्मण में ही लट् के समान आकार लेट्लकार का प्रयोग स्वीकार किया गया है, अन्यत्र नहीं। इसी लिए कहा है—"एषु पञ्चमो लकारश्छन्दोमात्रगोचरः"। कल्पसूत्र न तो मन्त्र है और न ब्राह्मण है। अतः, यहाँ लेट्लकार नहीं माना जा सकता है। 'षडङ्गमेके' इसके आधार पर कल्पसूत्र आदि को भी अपौरुषेय माना है, किन्तु, यह सभी के द्वारा समर्थित सिद्धान्त नहीं है, अतः अनादरणीय है। "अवाक्यशेषात् च" = वाक्यशेष अर्थात् अर्थवाद वाक्यों की उपलब्धि न होने से कल्पसूत्रादि अपौरुषेय नहीं है। वार्तिककार इन्हीं तर्कों के आधार पर कहा है कि जिन युक्तियों के आधार पर वेद की अपौरुषेयता सिद्ध होती है, उन्हीं युक्तियों के आधार पर स्मृतियां एवं कल्पसूत्र