मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context५०४ मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रभृति यत्, तस्य देशस्य चिह्नम्, तदाचारानुमेयश्रुतिगतोपपदवाक्यत्वेनाशङ्कितं तदनव- स्थितत्वाद् व्यभिचाराच्च कर्तृधर्मेण प्राच्यत्वादिना, श्यामत्वादिना च तुल्यमित्यर्थः । दिशस्तावद्देशविशेषचिह्नत्वासम्भवमुपपादयति—प्राग्देश इति । कृष्णमृत्तिकादेरनवस्थितत्वं यथेत्यादिभाष्योक्तमुपपादयति — मृत्तिकाद्यपीति । तत्र दक्षिणदेशे अन्यत्र च देशान्तरे तत्सममित्यर्थः । व्यभिचारानवस्थितत्वयोरितरेतरनैरपेक्ष्येऽप्युपपादननिराकरणार्थत्वं दर्शयितुं तस्मादित्युपसंहारभाष्यं तावद् व्याचष्टे-होलाकादीति । कृष्णमृत्तिकाप्रायेणापीति व्यभिचार इत्यादिभाष्यं व्याचष्टे-पुरुषापेक्षयेति । अत्राप्युपसंहारभाष्यमावृत्त्या योजयति- तस्मादिति । कर्तृविशेषवद्देशोऽपि होलाकादिव्यवस्थाकारणं न भवतीत्यर्थः ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीमत्त्रिकाण्डमीमांसामण्डनप्रतिवसन्तसोमयाजिभट्टमाधवात्मजभट्टसोमेश्वर- विरचितायां तन्त्रवार्तिकटीकायां सर्वानवद्यकारिण्यां न्यायसुधाख्यायां प्रथमाध्यायस्य तृतीयस्मृतिचरणपूर्वाद्धम् ॥ मा० प्र० —श्यामवर्णं बृहत्काय लोहित नेत्र वाले व्यक्ति आह्लीनैबुक आदि कर्म करते हैं, यह कहने पर जैसे वह अव्यभिचरित नहीं होता है, उसी प्रकार जिस देश की मृत्तिका प्रायः कृष्णवर्ण की होती है, वहाँ के व्यक्ति आह्लीनैबुक आदि अनुष्ठान करते हैं— यह कथन भी व्यभिचरित है । क्योंकि, जिस स्थान की मिट्टी काली नहीं है, ऐसे स्थानों में भी लोग इस अनुष्ठान को करते हैं । इसी प्रकार जहाँ की मिट्टी प्रायः कृष्णवर्ण की ही है; ऐसे स्थानों में इसका अनुष्ठान लोग नहीं करते हैं । अतः देश आदि को कर्म का विशेषण करना उचित नहीं है । अतः होलाक आदि देश विशेष में ही कर्तव्य है, अन्यत्र करणीय नहीं है—यह कहना उचित नहीं है । गौतमीय स्मृति केवल सामवेदियों के लिए ही अवलम्बनीय है—यह कहना भी ठीक नहीं है । यह सत्य है कि गौतम सामवेदीय थे एवं उनकी शिष्य परम्परा भी प्रायः सामवेदीय हो सकते हैं—इसलिए, इस प्रकार की किम्वदन्ती प्रचलित हो गई कि गौतमीय स्मृति समवेदीय के लिए ही अनुसरण योग्य है । वैश्वदेव यज्ञ की प्राचीन प्रवणता का उदाहरण भी इस स्थान में प्रयोज्य नहीं है, क्योंकि, वैश्वदेव् यज्ञ की प्राचीन प्रवणता साक्षात् श्रुति के द्वारा विहित है, प्रकृति में ऐसा नहीं है । तु=पूर्व आशङ्का के निवारण के लिए है, कर्तृधर्मेण तुल्यम्=कर्तृ विशेषण के समान, देश आदि को कर्ता का धर्म कहना एक ही समान है, कारण उसको कर्ता का धर्म मानने पर जो दोष होगा कर्मधर्म मानने पर भी वे ही दोष होंगे । आशय यह है कि कर्ता में अव्यवस्थित इत्यादि चिह्न कर्मों के साथ एकरूपता सिद्ध नहीं हो पाती हैं, क्योंकि, कृष्ण आदि अव्यवस्थित है । ऐसे स्थान पर भी अनुष्ठान होता है और नहीं भी होता है और अन्यत्र भी होता है, वैश्वदेव यज्ञ के समान होलाक