मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context६ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ३७ कृतस्तदतिस्पष्टत्वान्न वार्त्तिककृता व्याख्यातम् । ननु बहुतरक्लृप्ताग्निहोत्रादिविधिविरोधे- नैकस्य कल्प्यस्य पूर्णाहुत्यादिविधेरप्रामाण्यं युक्तम् इह तूभयोः प्रत्यक्षत्वेनाविशेषात्कथ- मेकान्ततः प्रतिषेधस्यैवाप्रामाण्यमित्याशङ्क्यानिरकरणार्थं भाष्यम्-कथं तत्प्रमाणमित्यादि । तत्र स्वयमाकुलत्वमुपपादयति-एतदेवेति । अप्राप्तस्य चयनस्य पृथिव्याधारत्वनिषेधा- योगात्प्राप्तिस्तावदङ्गीकार्या, पुनश्चानाधारचयनायोगात्तन्निषेधोऽपीत्येतदेवेत्यनेन परामृष्टम् । किं तद्विध्यन्तरमित्यपेक्षायामाह-विध्यन्तरं चेति । अस्य गुणपरत्वाच्चयनोत्पत्तिवाक्यो- पलक्षणार्थत्वं दर्शयितुमिष्टकावाक्योपन्यासः, स्तुत्यर्थत्वं चानाशङ्क्यमेदेत्याह-प्ररोचना- बुद्धिरिस्त्वति ॥ ५ ॥ भागी का अर्थ प्राप्य या प्रतिषेध के योग्य होता है, इसलिए अभागिप्रतिषेध का अर्थ अप्राप्त विषय का निषेध है, अर्थवाद वाक्य अप्राप्त का निषेध करता है, अतः अर्थवाद वाक्य अप्रमाण है । आशय यह है कि अर्थवाद के अप्रामाण्य के अन्य कारणों का निर्देश करते हुए जैमिनि ने कहा है 'अभागिप्रतिषेधात्' प्राप्त विषयों का ही निषेध होता है, क्योंकि अप्राप्त विषयों का निषेध नहीं हो सकता है । "न पृथिव्यामग्निश्चेतव्यो नान्तरिक्षे न दिवि" (तै० सं० ५-२-७) भूमि में अग्नि का चयन नहीं करना चाहिए, अन्तरिक्ष में एवं द्युलोक में अग्नि का चयन नहीं करना चाहिए, इस अर्थवाद वाक्य में अप्रसक्त अर्थात् स्वाभाविक प्रवृत्ति के अधीन अप्राप्त विषय का निषेध किया गया है, क्योंकि आकाश में या द्युलोक में अग्नि का चयन करना असम्भव होने से इन लोकों में अग्नि के चयन करने में कोई भी प्रवृत्त नहीं हो सकता है और जिस कार्य में स्वाभाविक प्रवृत्ति ही नहीं है उसके निषेध करने का कोई प्रयोजन नहीं है । इस प्रकार भूमि में अग्नि चयन का प्रतिषेध होने से अग्नि चयन विधि ही बाधित हो जायेगी, क्योंकि यदि भूमि में अग्नि का चयन नहीं किया जाय तो कहाँ अग्नि का चयन किया जायगा ? फलतः इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा अग्नि चयन की विधि ही बाधित हो जायगी । जिस अर्थवाद से विधि बाधित होगी वह अर्थवाद प्रमाण नहीं हो सकता है । इसलिए ये अर्थवाद अप्राप्त विषय के प्रतिषेधक हैं, अतः स्वार्थ में भी प्रमाण नहीं है ॥ ५ ॥ अनित्यसंयोगात् ॥ १.२.६ ॥ शा०] अनित्यसंयोगश्च वेदप्रामाण्ये सति । परं तु श्रुतिसामान्यमात्रमिति परिहृतः । इदानीं देवैकदेशानामाक्षिप्तानां पुनरुपोद्वलक उत्तिष्ठति, बबरः प्रावाहणिरकामयत वाचः प्रवदिता स्यामिति । (तै० सं० ७।१।३०) ॥ ६ ॥ ( इति पूर्वपक्षः )