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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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११० मुद्राराक्षस-

अब हमारे पहिले के रक्खे हुए हमारे हितकारी वरो को भी जो जो देने को कहा था वह देकर प्रसन्न करना। यह लोग प्रसन्न होगे तो अपना आश्रय छूट जाने पर सब भांति अपने उपकारी की सेवा करेंगे। सच्चे लोग कही नही भूलते तो भी हम स्मरण कराते है। इन मे से कोई तो शत्रु का कोष और हाथी चाहते हैं और कोई राज चाहते है। हम को सत्यवादी ने जो तीन अलङ्कार भेजे सो मिले। हम ने भी लेख अशून्य करने को कुछ भेजा है सो लेना। और जबानी हमारे अत्यन्त १० प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुन लेना * ।

मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! इस लेख का आशय क्या है ? भागुरायण ।—भद्र सिद्धार्थक ! यह लेख किस का है ? सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! मै नही जानता । भागुरायण ।—धूर्त ! लेख लेकर जाता है और यह नही १५ जानता कि किसने लिखा है, और संदेसा किस से कहैगा ? सिद्धार्थक ।—( डरते हुए की भांति ) आप से। भागुरायण ।—क्यों रे ! हम से ? सिद्धार्थक ।—आप ने पकड़ लिया। हम कुछ नही जानते २० कि क्या बात है। भागुरायण ।—( क्रोध से ) अब जानैगा । भद्र भासुरक ! इस को बाहर ले जाकर जब तक यह सब कुछ न बतलावे तब तक खूब मारो। पुरुष ।—जो आज्ञा ( सिद्धार्थक को बाहर ले कर जाता है २५ और हाथ मे एक पेटी लिए फिर आता है ) आर्य्य !


* यह वही लेख है जिस को चाणक्य ने शकटदास से धोखा देकर लिखवाया था और अपने हाथ से राक्षस की मुहर उस पर करके सिद्धार्थक को दिया थ ।