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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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छठा अङ्क। १२७

सिद्धार्थक ।—मित्र ! क्षमा करो। मुझ को देखते ही आर्य्य चाणक्य ने आज्ञा दी कि इस प्रिय वृत्तान्त को अभी चन्द्रमा सदृश प्रकाशित शोभावाले परम प्रिय महाराज प्रियदर्शन से जा कर कहो। मै उसी समय महाराज के पास चला गया और उन से निवेदन कर के यह सब पुरस्कार ५ पाकर तुम से मिलने को तुम्हारे घर अभी जाता ही था। समिद्धार्थक ।—मित्र ! जो सुनने के योग्य हो तो महाराज प्रियदर्शन से जो प्रियवृत्तान्त कहा है वह हम भी सुनें। सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम से भी कोई बात छिपी है ! सुनो ! आर्य्य चाणक्य की नीति से मोहित मति हो कर उस १० नष्ट मलयकेतु ने राक्षस को दूर कर दिया और चित्र- वर्म्मादिक पांचो प्रबल राजो को मरवा डाला। यह देखते ही और सब राजे अपने प्राण और राज्य का संशय समझ कर उस को छोड़ कर सैना सहित अपने अपने देश चले गए। जब शत्रु ऐसी निर्बल अवस्था मे हुआ, १५ तो भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुरात, बलगुप्त, राजसेन, भागु- रायण, रोहिताक्ष, विजयवर्मा इत्यादि लोगों ने मलयकेतु को कैद कर लिया। समिद्धार्थक ।—मित्र ! लोग तो यह जानते हैं कि भद्रभट इत्यादि लोग महाराज चन्द्रश्री को छोड़ कर मलयकेतु २० से मिल गए, तो क्या कुकवियों के नाटक की भांति इस के मुख में और तथा निर्वहण मे और बात है * ? सिद्धार्थक ।—वयस्य ! सुनो, जैसे दैव की गति नहीं जानी जाती वैसे ही आर्य्य चाणक्य की जिस नीति की भी गति नहीं जानी जाती उस को नमस्कार है। २५ समिद्धार्थक ।—हा ! कहो, तब क्या हुआ ?


* अर्थात् नाटक की उत्तमता यही है कि जिस वर्णन, रीति और रस से आरम्भ हो वैसे ही समाप्त हो यह नहीं कि पहिले कछ, पीछे कुछ ।