मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context१३६ मुद्राराक्षस-
मित परोच्छहु मै कियो, सरनश्रत प्रतिपाल ।
निरमल जस सिबि*-सो लियो, तुम या काल कराल ॥
(प्रकाश) भद्र ! तुम शीघ्र जाकर जिष्णुदास को जलने से रोको, हम जाकर अभी चन्दनदास को छुड़ाते हैं।
५ पुरुष ।—आर्य्य ! आप किस उपाय से चन्दनदास को छुड़ाइएगा ?
राक्षस ।—(आतङ्क से खड्ग मियान से खींच कर) इन दुखों में एकान्त मित्र निष्कृप कृपाण से ।
समर साध तन पुलकित नित साधा मम कर को ।
१० रन मह बारहि बार परखियौ जिन बल-पर को ॥
विगत जलद नभ नील खड्ग यह रोस बढ़ावत ।
मीत कष्ट सो दुखिहु मोहि रनहित उमगावत ॥
* शिवि ने शरणागत कपोत के हेतु अपना शरीर दे दिया था ।
राजा शिवि जब ६२ यज्ञ कर चुके और आगे फिर प्रारम्भ किया तब इन्द्र को भय हुआ कि अब मेरा पद लेने में आठ यज्ञ बाकी हैं, उस ने अग्नि को कपोत बनाया और आप बाज बन उन के मारने को चला, तब वह भागा हुआ राजा की शरण में गया । राजा ने उस का वचन सुन बाज को देख यज्ञशाला में अपनी गोदी में छिपा लिया और बाज को निवारण किया । बाज बोला कि महाराज ! आप यहा यह क्या अनर्थ करते हैं कि मेरा आहार छीन लिया ? मै भूख से शरीर को छोड आप को पापभागी करूंगा । तब राजा ने कहा कि इसे तो नहो देगे, इस के पलटे में जो मागेगा सो देँग, पश्चात इस के प्रति उत्तर में यह बात ठहरी कि राजा कबूतर के तुल्य तौल के शरीर का मास दे, तब हम कबूतर को छोड देवें । इस बात पर राजा ने प्रसन्न हो तुला पर एक ओर कपोत को बैठाय, दूसरी ओर अपने शरीर का मास काट कर चढाने लगे परन्तु सब शरीर का मास काट काट के चढाय दिया तौ भी कबूतर के समान नही हुआ । तब राजा ने गले पर खड्ग चलाया त्योही विष्णु ने हाथ पकड अपने लोक को भेज दिया ।