मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context१८६ मुद्राराक्षस-
मूरख स्वामी लहि गिरै, चतुर सचिव हू हारि ।
नदी तीर तरु जिमि नसै, तीरन ह्वै लहि बारि ॥
चाणक्य।—क्यों अमात्य राक्षस ! आप क्या चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हैं ?
५ राक्षस ।—इस मे क्या सन्देह है ?
चाणक्य ।—पर अमात्य ! आप शस्त्र ग्रहण नही करते, उस से सन्देह होता है कि आप ने अभी राजा पर अनुग्रह नही किया, इस से जो सच ही चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हों तो यह शस्त्र लीजिये ।
१० राक्षस ।—सुनो विष्णुगुप्त ! ऐसा कभी नही हो सकता, क्योंकि हम लोग उस योग्य नही, विशेष कर के जब तक तुम शस्त्र ग्रहण किए हो तब तक हमारे शस्त्र ग्रहण करने का क्या काम है ?
चाणक्य । - भला अमात्य ! आपने यह कहा से निकाला,
१५ कि हम योग्य हैं और आप अयोग्य हैं ? क्योंकि देखिये—
रहत लगामहि कसे अश्व की पीठ न छोडत ।
खान पान असनान भोग तजि सुख नहि मोडत ॥
छूटे सब सुख साज नीद नहि आवत नयनन ।
निसि दिन चौंकत रहन बीर सब भय धरि तिन मन ॥
२० वह हौदन सों सब छन कस्यौ नृप गजगन अवरोखिए ।
रिपुदर्प्प दूर कर अति प्रबल निज महात्मबल देखिए ॥
वा इन बातों से क्या ! आप के शस्त्र ग्रहण किये बिना तो चन्दनदास बचता भी नही ।
राक्षस । ( आप ही आप )
२५ नन्द नेह छूट्यौ नही, दास भए अरि साथ ।
ते तरु कैसे काटि ह, जे पाले निज हाथ ॥