मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
Page 145 of 173
Read in context१४८ मुद्राराक्षस -
का राज्य देते हैं” इस से तुम लोग खग जा कर उस को राज पर बिठा आश्रो।
पुरुष ।—जो आज्ञा।
चाणक्य ।—अजी अभी ठहरो, सुनो ! विजयपाल दुर्गपाल से यह कह दो कि अमात्य राक्षस के शस्त्र ग्रहण से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त यह आज्ञा करते हैं कि “चन्दनदास को सब नगरो का जगत्सेठ कर दो।”
पुरुष ।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त ! अब और मै क्या तुम्हारा प्रिय करू ?
१० राजा ।—इस से बढ़ कर और क्या भला होगा ?
मैत्री राक्षस सों भई, मिल्यौ अकटक राज।
नन्द नसे सब अब कहा, यासो बढि सुखसाज ॥
चाणक्य ।—(प्रतिहारी से) विजये ! दुर्गपाल विजयपाल से कहो कि “अमात्य राक्षस क मेल से प्रसन्न हो कर महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा करते हैं कि हाथी, घोड़ो को छोड कर और सब बन्धुओ का बन्धन छोड़ दो” वा जब अमात्य राक्षस मन्त्री हुए तब अब हाथी घोड़ो का क्या सोच है ? इस से—
छोड़ौ सब गज तुरग अब, कछु मत राखौ बाधि।
२० केवल हम बाधत सिखा, निज प्रतिज्ञा साधि ॥
(शिखा बाघता है)
प्रतिहारी ।—जो आज्ञा (जाती है)।
चाणक्य ।—अमात्य राक्षस ! मै इस से बढ़ कर और कुछ भी आप का प्रिय कर सकताहूँ ?