मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context१५८ मुद्राराक्षस—
दीवार और उस मे ५७० बुर्ज और ६४ फाटक लिखे है। यूनानी लोग जो इस देश को Prassi प्रास्सि कहते है वह पलाशी का अपभ्रंश बोध होता है, क्योंकि जैनग्रन्थों मे उस भूमि के पलाश वृत्त से आच्छादित होने का वर्णन देखा गया है। ५ जैन और बौद्धों से इस देश से और भी अनेक सम्बन्ध हैं। मसीह से छ सौ बरस पहले बुद्ध पहले पहल राजगृह ही मे उदास हो कर चले गए थे। उस समय इस देश की बड़ी समृद्धि लिखी है और राजा का नाम बिम्बसार लिखा है। (जैन लोग अपने बीसवे तीर्थङ्कर सुव्रत स्वामी का राजगृह में १० कल्याणक भी मानते है)। बिम्बसार ने राजधानी के पास ही इनके रहने को कलंद नामक बिहार भी बना दिया था फिर अजातशत्रु और अशोक के समय मे भी बहुत से स्तूप बने। बौद्धों के बडे बडे धर्मसमाज इस देश मे हुए। उस काल में हिन्दू लोग इस बौद्ध धर्म के अत्यन्त विद्वेषी थे। क्या १५ आश्चर्य्य है कि बुद्धों के द्वेष ही से मगध देश को इन लोगों ने अपवित्र ठहराया हो और गौतम की निन्दा ही के हेतु अहल्या की कथा बनाई हो।
भारत नक्षत्र नक्षत्री राजा शिवप्रसाद साहब ने अपने
इतिहास तिमिरनाशक के तीसरे भाग मे इस समय और देश २० के विषय में जो लिखा है वह हम पीछे प्रकाशित करते है। इस से बहुत सी बाते उस समय की स्पष्ट हो जायगी।
प्रसिद्ध यात्री हिआन सांग सन ६३७ ई० मे जब भारत
वर्ष मे आया था तब मगध देश हर्षवर्द्धन नामक कन्नौज के राजा के अधिकार मे था। किन्तु दूसरे इतिहासलेखक सन् २५ २०० से ४०० तक बौद्ध कर्णवंशी राजाओ को मगध का राजा बतलाते है और अन्ध्रवंश का भी राज्यचिन्ह सम्भलपुर मे दिखलाते हैं।