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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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द्वितीय अङ्क । ६३

विराधगुप्त ।—महाराज ! कुछ न पूछिये। राक्षस ।—( घबड़ाकर ) क्यों क्यों ! क्या चाणक्य ने जान लिया ? विराधगुप्त ।—नही तो क्या ? राक्षस ।—कैसे ? ५ विराधगुप्त ।—महाराज ! चन्द्रगुप्त के सोने जाने के पहिले ही वह दुष्ट चाणक्य उस घर मे गया और उस को चारो ओर से देखा तो भीतर को एक दरार से चिउटी लोग चावल के कने लातां है। यह देख कर उस दुष्ट ने निश्चय कर लिया कि इस घर के भीतर मनुष्य छिपे है, बस, १० यह निश्चय कर उस ने उस घर में आग लगवा दिया और धूंआ से घबड़ा कर निकल तो सके ही नही, इस से वे बीभत्सकादिक वही भीतर ही जल कर राख हो गए । राक्षस ।—( सोच से ) मित्र ! देख, चन्द्रगुप्त का भाग्य कि १५ सब के सब मर गये। ( चिन्ता सहित ) अहा ! सखा ! देख इस दुष्ट चन्द्रगुप्त का भाग्य ! ! ! कन्या जो विष की गई, ताहि हतन के काज । तासों मार्यौ पर्व्वतक, जाको आधो राज ॥ सबै नसे कलबल सहित, जे पठये बघ हेत । २० उलटी मेरी नीति सब, मौर्यहिको फल देत ॥ विराधगुप्त ।—महाराज ! तब भी उद्योग नही छोड़ना चाहिये— प्रारम्भ ही नहि बिघ्न के भय अधम जन उद्यम सजैं। पुनि करहि तौ कोउ विघ्न सों डरि मध्य ही मध्यम तजैं॥ २५ धरि लात विघ्न अनेक पै निरभय न उद्यम ते टरैं। जे पुरुष उत्तम अन्त मैं ते सिद्ध सब कारज करैं ॥