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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

तृतीय अङ्क । ८५

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तृतीय अङ्क । ८५

कि इन्हीं लोगों ने पर्व्वतक को भी मरवा डाला और जो आधा राज देकर अब मेल कर लें तो भी उस बिचारे पर्व्व- तक के मारने का पाप ही पाप हाथ लगे । इससे मलयकेतु को भागने समय छोड़ दिया ।

चन्द्रगुप्त ।—और भला राक्षस इसी नगर मे रहता था, उस का ५ भी आप ने कुछ न किया इस का क्या उत्तर है ?

चाणक्य ।--सुनो, राक्षस अपने स्वामी की स्थिर भक्ति से और यहां के बहुत दिन के रहने से यहां के लोगों का और नन्द के सब साथियों का विश्वासपात्र हो रहा है और उस का स्वभाव सब लोग जान गए हैं और उसमें बुद्धि १० और पौरुष भी है वैसे ही उस के सहायक भी हैं और कोषबल भी है, इस से जो वह यहां रहे तो भीतर के सब लोगों को फोड़ कर उपद्रव करे और जो यहां से दूर रहे तो वह ऊपर जोड़ जोड़ लगावे पर उन के मिटाने में इतनी कठिनाई न हो इस से उसके जाने के समय १५ उपेक्षा कर दी गई ।

चन्द्रगुप्त ।--तो जब वह यहां था तभी उस को वश में क्यों नही कर लिया ?

चाणक्य ।--वश क्या कर लें, अनेक उपायों से तो वह छाती मे गड़े कांटे की भांति निकाल कर दूर किया गया है । उसे २० दूर करने में और कुछ प्रयोजन ही था ।

चन्द्रगुप्त । तो बल से क्यों नही पकड़ रक्खा ?

चाणक्य ।—वह राक्षस ऐसा नहीं है, उस पर जो बल किया जाय तो यातो वह आप मारा जाय या तुम्हारा नाश करदे ।

और—

हम खोवैं इक महत नर जो वह पावै नास । २५ जो वह नासै सैन तुम तौहू जिय अति त्रास ॥

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८६ मुद्राराक्षस-

तासों कल बल करि बहुत अपने बस करि वाहि ।
जिमि गज पकरैं सुघर तिमि बाघेंगे हम ताहि ॥

चन्द्रगुप्त ।—मै आप की बात तो नही काट सकता, पर इस से तो मन्त्री राक्षस ही बढ चढ के जान पडता है ।

चाणक्य ।—( क्रोध से ) 'आप नहीं' इतना क्यों छोड दिया ? ऐसा कभी नही है उसने क्या किया है कहो तो ?

चन्द्रगुप्त ।—जो आप न जानते हों तो सुनिये कि वह महात्मा
जदपि आपु जीती पुरी तदपि धारि कुशलात ।
जब लो जित चाहौ रहौ धारि सीस पै लात ॥
१० डोडी फेरन के समय निज बल जय प्रगटाय ।
मेरे बल के लोग कौ दीनों तुरत हराय ॥
मोहि परिजन रीति सों जाके सब बिनु त्रास ।
जौ मोपै निज लोकहू आनहि नहि विश्वास ॥

चाणक्य ।—( हस कर ) वृषल ! राक्षस ने यह सब किया ?
१५ चन्द्रगुप्त ।—हा ! हा ! अमात्य राक्षस ने यह सब किया ।

चाणक्य । - तो हमने जाना, जिस तरह नन्द का नाश करके तुम राजा हुए वैसे ही अब मलयकेतु राजा होगा ।

चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! यह उपालम्भ आप को नही शोभा देता, करने वाला सब दैव है ।

२० चाणक्य ।—रे कृतघ्न !
अतिहि क्रोध करि खोलि कै, सिखा प्रतिज्ञा कीन ।
सो सब देखत भुब करो, नव नृप नन्द विहीन ॥
घिरी स्वान अरु गीध सों, भय उपजावनिहारि ।
जारि नन्दहू नहि भई, सान्त मसान दवारि ॥

२५ चन्द्रगुप्त ।—यह सब किसी दूसरे ने किया ।

चाणक्य ।—किस ने ?

चन्द्रगुप्त ।—नन्दकुल के द्वेषी दैव ने ।

तृतीय अङ्क । ८७

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तृतीय अङ्क । ८७

चाणक्य । —देव तो मूर्ख लोग मानते है ।
चन्द्रगुप्त ।—और विद्वान् लोग भी यद्वा तद्वा करते है ।
चाणक्य ।—( क्रोध नाट्य कर के ) अरे वृषल ! क्या नौकरों की तरह मुझ पर आज्ञा चलाता है ?
खुली सिखाह बांधिबे चञ्चल भे पुनि हाथ ।
( क्रोध से पैर पृथ्वी पर पटक कर )
घोर प्रतिज्ञा पुनि चरन करन चहत कर साथ ॥
नन्द नसे सौं निरज ह्‌वै तू फूल्यौ गरबाय ।
सो अभिमान मिटाइहौं तुरतहि तोहि गिराय ॥
चन्द्रगुप्त ।—( घबड़ा कर ) अरे ! क्या आर्य्य को सचमुच क्रोध आ गया !
फर फर फरकत अधर पुट, भए नयन जुग लाल ।
चढ़ी जाति भौंहै कुटिल, स्वास तजत जिमि ब्याल ॥
मनहुँ अचानक रुद्रदृग खुल्यौ त्रितिय दिखरात ।
( आवेग सहित )
धरनी बार्यौ बिनु धसे हा हा किमि पदघात ॥
चाणक्य ।—(नकली क्रोध रोक कर) तो वृषल ! इस कोरी बकवाद से क्या लाभ है ! जो राक्षस चतुर है तो यह शस्त्र उसी को दे । (शस्त्र फेंक कर और उठ कर) (आप ही आप) ह ह ह ! राक्षस ! यही तुम ने चाणक्य को जीतने का उपाय किया ।
तुम जानौ चाणक्य सों नृप चन्दहि लरवाय ।
सहजहि लैहै राज हम निज बल बुद्धि उपाय ॥
सो हम तुमही कह छलन कियो क्रोध परकास ।
तुमरोई करिहै उलटि यह तुव भेद बिनास ॥
( क्रोध प्रकट करता हुआ चला जाता है )
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य वैहीनार ! “चाणक्य का अनादर कर के

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८८ मुद्राराक्षस--

आज से हम सब काम काज आपही सम्हालेंगे' यह लोगों से कह दो।
कञ्चुकी।-- (आप ही आप) अरे ! आज महाराज ने चाणक्य के पहले आर्य्य शब्द नहीं कहा ! क्यों ? क्या सच ५ मुच अधिकार छीन लिया ? वा इस में महाराज का क्या दोष है।

सचिव दोष सों होत हैं, नृपहु बुरे तत्काल।
हाथीवान प्रमाद सों, गज कहवावत व्याल ॥

चन्द्रगुप्त ।--क्यों जी ? क्या सोच रहे हो ?
१० कञ्चुकी ।--यही कि महाराज को महाराज शब्द अब यथार्थ शोभा देता है।
चन्द्रगुप्त ।--(आप ही आप) इन्ही लोगों के धोखा खाने से आर्य्य का काम होगा। (प्रगट) शोणोत्तरे ! इस सूखी कलह से हमारा सिर दुखने लगा, इस से शयनगृह का १५ मार्ग दिखलाओ।
प्रतिहारी।--इधर आवें महाराज, इधर आवें।
चन्द्रगुप्त ।--(उठ कर चलता हुआ आप ही आप)

गुरु आयसु छल सों कलह, करिहू जीय डराय।
किमि नर गुरुनन सों लरहि, यहै सोच जिय हाय ॥

२० (सब जाते हैं--जवनिका गिरती है,

॥ तृतीय अङ्क समाप्त हुआ ॥

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चतुर्थ अंक

स्थान—मन्त्री राक्षस के घर के बाहर का प्रान्त।

(करभक घबड़ाया हुआ आता है)

करभक ।— अहाहा हा ! अहाहा हा !
अतिशय दुरगम ठाम मै, सत जोजन सौं दूर। ५
कौन जात है धाइ बिनु, प्रभु निदेस भरपूर॥
अब राक्षस मन्त्री के घर चलूं (थका सा घूम कर)
अरे कोई चौकीदार है? स्वामी राक्षस मन्त्री से जाकर कहो कि 'करभक काम पूरा कर के पटने से दौड़ा आता है'। १०

(दौवारिक आता है)
दौवारिक ।— अजी ! चिल्लाओ मत, स्वामी राक्षस मन्त्री को राजकाज सोचने २ सिर मे ऐसी बिथा हो गई है कि अब तक सोने के बिछोने से नहीं उठे, इस से एक घड़ी भर ठहरो, अवसर मिलता है तो मै निवेदन किये देता हूं। १५
(परदा उठता है और सोने के बिछौने पर चिन्ता में भरा राक्षस और शकटदास दिखाई पड़ते हैं)

राक्षस ।— (आप ही आप) -
कारज उलटो होत है, कुटिल नीति के जोर।
का कीजै सोचत यही, जागि होय है भोर॥ २०

और भी।
आरम्भ पहिले साचि रचना चेरा की करि लावहीं।
इक बात मै गर्भित बहुत फल गूढ़ भेद दिखावहीं॥
कारन अकारन सोचि फैली क्रियन कों सकुचावहीं।
जे करहि नाटक बहुत दुख हम सरिस तेऊ पावहीं॥ २५

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६० मुद्राराक्षस

और भी वह दुष्ट ब्राह्मण चाणक्य —
दौवारिक ।—जय जय ।
राक्षस । - किसी भांति मिलाया या पकड़ा जा सकता है ?
दौवारिक । - अमात्य—
५ राक्षस ।—( बाए नेत्र के फड़कने का अपशकुन देख कर आप ही आप ) 'ब्राह्मण चाणक्य जय जय' और 'पकड़ा जा सकता है ? अमात्य' यह उलटी बात हुई और उसी समय असगुन भी हुआ । तौ भी क्या हुआ, उद्यम नही छोड़ेंगे ( प्रकाश ) भद्र ! क्या कहता है ?
१० दौवारिक ।—अमात्य ! पटने से करभक आया है सो आप से मिला चाहता है ।
राक्षस ।—अभी लाओ ।
दौवारिक ।—जो आज्ञा ( करभक के पास जाकर, उसको संग ले आकर ) भद्र ! मन्त्री जी वह बैठे हे, उधर जाओ
१५ ( जाता है ) ।
करभक ।—( मन्त्री को देख कर ) जय हो, जय हो ।
राक्षस ।—अजी करभक ! आओ आओ, अच्छे हो ?—बैठो ।
करभक ।—जो आज्ञा ( पृथ्वी पर बैठ जाता है ) ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) अरे ! मै ने इस को किस काम का भेद लेने को भेजा था यह भूला जाता है ( चिन्ता-
२० करता है ) ।
( बेत हाथ में लेकर एक पुरुष आता है )
पुरुष ।— हटे रहना—बचे रहना—अजी दूर रहो—दूर रहो, क्या नही देखते ?
२५ नृप द्विजादि जिन नरन को, मंगल रूप प्रकास ।
ते न नीच मुखह लखहि, कैसो पास निवास ॥*


* प्राचीनकाल में आचार्य, राजा आदि नीचो को नही दखते थे।

चतुर्थे अङ्क । ६१

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चतुर्थे अङ्क । ६१

(आकाश की ओर देख कर) अजी क्या कहा, कि क्यों हटाते हो ? अमात्य राक्षस के सिर में पीडा सुन कर कुमार मलयकेतु उन को देखने को इधर ही आते हैं (जाता है)।

(भागुरायण और कञ्चुकी के साथ मलयकेतु आता है)। ५
मलयकेतु ।—(लम्बी सास लेकर—आप ही आप) हा ! देखो पिता को मरे आज दस महीने हुए और व्यर्थ वीरता का अभिमान कर के अब तक हम लोगों ने कुछ भी नहीं किया, बरन तर्पण करना भी छोड़ दिया। या क्या हुआ, मैं ने तो पहिले यही प्रतिज्ञा ही किया है। १०

कर वलय उर ताड़त गिरे, आचरहु की सुधि नहि परी ।
मिलि करहि आरतनाद हाहा, अलक खुलि रज सों भरी ॥
जो शोक सों भइ मात गन की दशा सो उलटाइ है ।
करि रिपु जुवतिगन की सोई गति पितहि तृप्ति कराइ है ॥
और भी— १५
रन मरि पितु ढिग जात हम, बीरन की गति पाइ ।
कै माता दृग जल भग्न, रिपु जुवती मुख लाइ ॥

(प्रकाश) अजी जाजले ! सब राजा लोगों से कहो कि “मैं बिना कहे सुने राक्षस मन्त्री के पास अकेला जाकर उन को प्रसन्न करू गा” इस से वे सब लोग उधर ही २० ठहरैं ।

कञ्चुकी । जो आज्ञा (घूमते २ नेपथ्य की ओर देख कर ।)
अजी राजा लोग ! सुनो, कुमार की आज्ञा है कि मेरे साथ कोई न चलै (देख कर आनन्द से) महाराजकुमार ! आप देखिये । आप की आज्ञा सुनते ही सब राजा रुक गए— २५
अति चपल जे रथ चलत ते, सुनि चित्र से तुरतहि भए ।
जे खुरन खोदत नभ पर्थाहि, ते बाजिगन झुकि रुक गए ॥

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६२ मुद्राराक्षस -

जे रहे धावत ठिठकि ते, गज मूक घण्टा सह सधे ।
मरजाद तुव नहिं तजहि नृपगण, जलधि से मानहु बँधे ।

मलयकेतु ।—अजी जाजले ! तुम भी सब लोगों को लेकर जाओ, एक केवल भागुरायण मेरे संग रहे ।
कचुकी ।—जो आज्ञा (सब को लेकर जाता है ) ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब मैं यहां आता था तो भद्रभट प्रभृति लोगों ने मुझ से निवेदन किया कि “हम राक्षस मन्त्री के द्वारा कुमार के पास नहीं रहना चाहते, कुमार के सेनापति शिखरसेन के द्वारा रहेंगे । दुष्ट मन्त्री १० ही के डर से तो चन्द्रगुप्त को छोड़ कर यहां सब बात का सुभीता जान कर कुमार का आश्रय लिया है ।” सो उन लोगों की बात का मैं ने आशय नहीं समझा ।*
भागुरायण ।—कुमार ! यह तो ठीक ही है क्योंकि अपने कल्याण के हेतु सब लोग स्वामी का आश्रय हित और १५ प्रिय के द्वारा करते हैं ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! तो फिर राक्षस मन्त्री तो हम लोगों का परमप्रिय और बड़ा हित है ।
भागुरायण ।—ठीक है, पर बात यह है कि अमात्य राक्षस का बैर चाणक्य से है, कुछ चन्द्रगुप्त से नहीं है, इस से जो २० चाणक्य की बातों से रूठ कर चन्द्रगुप्त उन से मन्त्री का काम ले ले और नन्दकुल की भक्ति से “यह नन्द ही के वश का है” यह सोच कर राक्षस चन्द्रगुप्त से मिल जाय और चन्द्रगुप्त भी अपने बड़े लोगों का पुराना मन्त्री समझ कर उस को मिला ले, तो ऐसा न हो कि कुमार हम लोगों पर भी विश्वास न करें ।
२५


* चाणक्य के मन्त्रणी से लगाने मलयकेतु से ऐसा कहा था ।

चतुर्थ अङ्क । ६३

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चतुर्थ अङ्क । ६३

मलयकेतु ।—ठीक है, मित्र भागुरायण ! राक्षस मन्त्री का घर कहा है ? भागुरायण ।—इधर कुमार इधर [ दोनों घूमते हैं ] कुमार ! यही राक्षस मन्त्री का घर है—चलिए । मलयकेतु ।—चले ( दोनों राक्षस के निकट जाते हैं )। ५ राक्षस ।—अहा ! स्मरण आया ( प्रकाश ) कहो जी ! तुम ने कुसुमपुर में स्तनकलस वैतालिक को देखा था ? करभक ।- क्यों नही ? मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब तक कुसुमपुर की बाते हों तब तक हम लोग इधर ही ठहर कर सुनें कि क्या १० बात होती है, क्योंकि—

भेद न कछु जामै खुले, याहीं भय सब ठौर ।
नृप सों मन्त्री जन कहहि, बात और की और ॥

भागुरायण ।—जो आज्ञा ( दोनों ठहर जाते हैं )। राक्षस ।—क्यो जी ! काम सिद्ध हुआ ? १५ करभक ।—अमात्य की कृपा से सब काम सिद्ध ही है । मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! वह कौन सा काम है ? भागुरायण । कुमार ! मन्त्री के जी की बातें बडी गुप्त हैं। कौन जान ? इस से देखिये अभी सुन लेते हैं कि क्या कहते हैं । २० राक्षस ।—अजी, भली भांति कहो । करभक ।—सुनिये—जिस समय आप ने आज्ञा दिया कि करभक, तुम जाकर वैतालिक स्तनकलस से कह दो कि जब २ चाणक्य चन्द्रगुप्त की आज्ञा भङ्ग करे तब तब तुम ऐसे श्लोक पढो जिस से उस का जी और भी फिर जाय । २५ राक्षस ।—हा, तब ? करभक ।- तब मै ने पटने में जाकर स्तनकलस से आप का सन्देसा कह दिया ।

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६४ मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—तब ? करभक ।—इस के पीछे नन्दकुल के विनाश से दु खी लोगो का जी बहलाने के हेतु चन्द्रगुप्त ने कुसुमपुर मे कौमुदी-महोत्सव होने की डौंडी पिटा दी और उस को बहुत दिन से बिछुडे हुए मित्रों के मिलाप की भांति पुर के निवासियोँ ने बडी प्रसन्नतापूर्वक स्नेह से मान लिया । राक्षस ।—(आंसू भर कर) हा देव नन्द !

यद्यपि उदित कमुदन सहित, पाइ चादनी चान्द ।
तदपि न तुम बिन लसत हे, नृपससि ! जगदानन्द ॥

हा, फिर क्या हुआ ? करभक ।—तब चाणक्य दुष्ट ने सब लोगों के नेत्र के परमानन्ददायक उस उत्सव को रोक दिया और उसी समय स्तनकलस ने ऐसे ऐसे श्लोक पढे कि राजा का भी मन फिर जाय । राक्षस ।—वाह मित्र स्तनकलस, वाह क्योँ न हो ! अच्छे समय में भेदबीज बोया है, फल अवश्य होगा । क्योँकि—

नृप रूठे अचरज कहा, सकल लोग जा सङ्ग ।
छोटे हू मानैँ बुरो परे रंग में भङ्ग ॥

मलयकेतु ।—ठीक हे (नृप रूठे यह दोहा फिर पढता है) राक्षस ।—हा, फिर क्या हुआ ? करभक ।—तब आज्ञाभङ्ग से रुष्ट हो कर चन्द्रगुप्त ने आप की बड़ी प्रशंसा की और दुष्ट चाणक्य से अधिकार ले लिया । मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! देखो प्रशंसा कर के राक्षस मे चन्द्रगुप्त ने अपनी भक्ति दिखायी । भागुरायण ।—गुण प्रशंसा से बढ़ कर चाणक्य का अधिकार लेने से ।

चतुर्थ अङ्क । ६५

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चतुर्थ अङ्क । ६५

राक्षस ।—क्यों जी, एक कौमुदीमहोत्सव के निषेध ही से
चाणक्य चन्द्रगुप्त मे बिगाड़ हुआ कि कोई और
कारण भी है ?
मलयकेतु ।—क्यों मित्र भागुरायण ! अब और बेर मे यह
क्या फल निकालैंगे ? ५

भागुरायण ।—यह फल निकाला है कि चाणक्य बड़ा बुद्धि-
मान् है, वह व्यर्थ चन्द्रगुप्त को क्रोधित न करावैगा और
चन्द्रगुप्त भी उस की बातै जानता है, वह भी बिना बात
चाणक्य का ऐसा अपमान न करैगा, इससे उन लोगों
मे बहुत झगड़े से जो बिगाड़ होगा तो पक्का होगा । १०
करभक ।—आर्य्य ! और भी कई कारण है ।
राक्षस ! कौन ?
करभक ।—कि जब पहिले यहा से राक्षस और कुमार मलय-
केतु भागे तब उस ने क्यों नही पकड़ा ?
राक्षस ।—( हर्ष से ) मित्र शकटदास ! अब तो चन्द्रगुप्त १५
हाथ मे आ जायगा ।

शकटदास ।—अब चन्दनदास छूटैगा, और आप कुटुम्ब से
मिलगे, वैसे ही जीवसिद्धि इत्यादि लोग क्लेश से छूटैंगे ।
भागुरायण । ( आप ही आप ) हा, अवश्य जीवसिद्धि
का क्लेश छूटा । २०
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! अब मेरे हाथ चन्द्रगुप्त
आवैगा, इस मे इन का क्या अभिप्राय है ?

भागुरायण ।—और क्या होगा ? यही होगा कि यह चाणक्य
से छूटे चन्द्रगुप्त के उद्धार का समय देखते हैं *


* राक्षस ने तो 'चन्द्रगुप्त हाथ में आवैगा' इस आशय से कहा था कि चन्द्रगुप्त जीता जायगा पर भागुरायण ने भेद कराने को मलयकेतु को उस का उलटा अर्थ समझाया ।

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६६ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।-अजी, अब अधिकार छिन जाने पर वह ब्राह्मण कहां है ? करभक ।-अभी तो पटने ही में है । राक्षस ।-( घबडा कर ) हैं ! अभी वहीं है ? तपोबन नहीं चला गया ? या फिर कोई प्रतिज्ञा नहीं की ? करभक । - अब तपोबन जायगा -ऐसा सुनते हैं । राक्षस । -(घबडा कर ) शकटदास, यह बात तो काम की नहीं, देव नन्द को नहि गन्यो जिन भीतर अपमान । सो निज कृत नृप चन्द की बात न सहिहै जान ॥ १० मलयकेतु । मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोबन जाने वा फिर प्रतिज्ञा करने से कौन कार्यसिद्धि निकाली है ? भागुरायण ।-कुमार ! यह तो कोई कठिन बात नहीं है, इस का आशय तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रगुप्त से जितनी दूर चाणक्य रहेगा उतनी ही कार्यसिद्धि होगी । १५ शकटदास । अमात्य ! आप व्यर्थ सोच न करें, क्योंकि देखें सबहि भाँति अधिकार लहि, अभिमानी नृप चन्द । नहि सहिहै अपमान अब, राजा होइ स्वच्छन्द ॥ तिमि चाणक्यहु पाइ दुख एक प्रतिज्ञा पारि । अब दूजो करिहै न कछु उद्यम निज मद चूरि ॥ २० राक्षस । - ऐसाही होगा । मित्र शकटदास ! जाकर करभक को डेरा इत्यादि दो । शकटदास ।-जो आज्ञा । ( करभक को लेकर जाता है ) राक्षस ।-इस समय कुमार से मिलने की इच्छा है । २५ मलयकेतु ।-(आगे बढ कर ) मै आप ही आप से मिलने को आया हूँ ।

चतुर्थ अङ्क । ६७

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चतुर्थ अङ्क । ६७

राक्षस ।- (स भ्रम से उठ कर ) अरे कुमार आप ही आ गए ! आइए, इस आसन पर बैठिए । मलयकेतु ।—मैं बैठता हूँ आप विराजिए । ( दोनों बैठते हैं ) मलयकेतु ।—इस समय सिर की पीड़ा कैसी है ? ५ राक्षस ।—जब तक कुमार के बदले महाराज कह कर आप को नही पुकार सकते तब तक यह पीड़ा कैसे छूटेगी *। मलयकेतु ।—आप ने जो प्रतिज्ञा की है तो सब कुछ होईगा । परन्तु सब सेना सामन्त के होते भी अब आप किस बात का आसरा देखते हैं ? १० राक्षस ।—किसी बात की नही, अब चढ़ाई कीजिए । मलयकेतु ।—अमात्य ! क्या इस समय शत्रु किसी सङ्कट में है ? राक्षस ।—बड़े । मलयकेतु ।—किस सङ्कट में ? १५ राक्षस ।—मन्त्रीसङ्कट में । मलयकेतु ।—मन्त्रीसङ्कट तो कोई सङ्कट नही है । राक्षस ।—और किसी राजा को न हो तो न हो, पर चन्द्रगुप्त का तो अवश्य है । मलयकेतु ।—आर्य्य ! मेरी जान में चन्द्रगुप्त को और भी २० नहीं है । राक्षस ।—आप ने कैसे जाना कि चन्द्रगुप्त को मन्त्रीसङ्कट सङ्कट नही है ? मलयकेतु ।—क्योंकि चन्द्रगुप्त के लोग तो चाणक्य के कारण उस से उदास रहते हैं, जब चाणक्य ही न रहेगा तब २५ उस के सब कामों को लोग और भी सन्तोष से करेंगे ।


* अर्थात् - द्रगुप्त को जीत कर जब आप को महाराज बना लेगे तब स्वस्थ होगे ।

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६८ मुद्राराक्षस-

राक्षस ।—कुमार, ऐसा नही है, क्योंकि यहा दो प्रकार के लोग हैं—एक चन्द्रगुप्त के साथी, दूसरे नन्दकुल के मित्र, उन मे जो चन्द्रगुप्त के साथी हैं उन को चाणक्य ही से दुख या कुछ नन्दकुल के मित्रों को नही, क्योकि ५ वह लोग तो यही सोचते है कि इसी कृतघ्न चन्द्रगुप्त ने राज के लोभ से अपना पितृकुल नाश किया है, पर क्या करें उन का कोई आश्रय नही है इस से चन्द्रगुप्त के आसरे पडे है, जिस दिन आप को शत्रु के नाश म और अपने पक्ष के उद्धार में समर्थ देखेंगे उसी दिन १० चन्द्रगुप्त को छोड कर आप से मिल जायंगे, इस के उदाहरण हमी लोग हैं ।
मलयकेतु ।- आर्य्य । चन्द्रगुप्त के हाग्ने का एक यही कारण है कि कोई और भी है ?
राक्षस ।—और बहुत क्या होंगे एक यही बडा भारी ह ।
१५ मलयकेतु ।—क्यों आर्य्य । यही क्या प्रधान है ? क्या चन्द्र गुप्त और मन्त्रियों से आप अपना काम करने मे असमर्थ है ?
राक्षस ।—निरा असमर्थ है ।
मलयकेतु ।—क्यो ?
२० राक्षस ।—यों कि जो आप राज्य सम्भालते हैं या जिन का राज राजा और मन्त्री दोनों करते हैं वह राजा ऐसे हों तो हो, परन्तु चन्द्रगुप्त तो कदापि ऐसा नही है । चन्द्रगुप्त एक तो दुरात्मा है दूसरे वह तो सचिव ही के भरोसे सब काम करता है, इस से वह कुछ व्यवहार जानता ही नही २५ तो फिर वह सब काम कैसे कर सकता है ? क्योंकि—
लक्ष्मी करत निवास अति, प्रबल सचिव नृप पाय ।
वै निज बाल-सुभाव सों, इकहि तजत अकुलाय ॥

चतुर्थ अङ्क । ६६

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चतुर्थ अङ्क । ६६

और भी—

जो नृप बालक सो रहत, सदा सचिव के गोद ।
बिन कछु जग देखे सुने, सो नहि पावत मोद ॥

मलयकेतु ।—( आप ही आप ) तो हम अच्छे हैं, कि सचिव के अधिकार में नहीं ( प्रकाश ) अमात्य ! यद्यपि यह [५]
ठीक है तथापि जहा शत्रु के अनेक छिद्र हैं तहा एक इसी सिद्धि से सब काम न निकलैगा ।

**राक्षस ।—**कुमार के सब काम इसी से सिद्ध होंगे । देखिए,
चाणक्य को अधिकार छूट्यौ चन्दू है राजा नए ।
पुर नन्द में अनुरक्त तुम निज बल सहित चढते भए ॥ [१०]
जब आप हम—( कह कर लज्जा से कुछ ठहर जाता है )
तुव बस सकल उद्यम सहित रन मति करी ।
वह कौन सी नृप ! बात जो नहि सिद्धि ह्वै है ता घरी ॥

**मलयकेतु ।—**अमात्य ! जो अब आप ऐसा लड़ाई का समय देखते हैं तो देर कर के क्यों बैठे हैं ? देखिए— [१५]

इन को ऊंचो सीस है, बाको उच्च करार ।
श्याम दोऊ वह जल श्रवत, ये गण्डन मधु धार ॥
उते भँवर को शब्द इत, भँवर करत गुजार ।
निज सम तेहि लखि नास्ति हैं, दन्तन तोरि कुठार ॥
सीस सोन सिन्दूर सों, ते मतङ्ग बल दाप । [२०]
सोन सहज ही सोखि हैं, निश्चय जानहु आप ॥*

और भी ।

गरजि गरजि गभीर रव, बरसि बरसि मधुधार ।
सत्रु नगर गज घेरिहैं, घन जिमि बिबुध पहार ॥
(शस्त्र उठाकर भागुरायण के साथ जाता है) [२५]


* पटना घेरने में सोन उतर कर जाना था ।

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१०० मुद्राराक्षस-

राक्षस। —कोई है? [ प्रियम्बदक आता है ]

प्रियम्बदक। —आज्ञा ! राक्षस। —देख तो द्वार पर कौन भिक्षुक खड़ा है? ५ प्रियम्बदक। —जो आज्ञा [ बाहर जा कर फिर आता है अमात्य ! एक क्षपणक भिक्षुक। राक्षस। —( असगुन जान कर आप ही आप ) पहिले ही क्षपणक का दर्शन हुआ। प्रियम्बदक। —जीवसिद्धि नाम। १० राक्षस। —अच्छा, बोलाकर ले आ। प्रियम्बदक। —जो आज्ञा ( जाता है ) ( क्षपणक आता है ) क्षपण। — पहिले कटु परिणाम मधु औषध सम उपदेस। मोह व्याधि के वैद्य गुरु, तिनको सुनहु अदेस ॥ [ पास जाकर ] उपासक ! धर्म लाभ हो ! १५ राक्षस — जोतिषी जी, बताओ, अब हम लोग प्रस्थान किस दिन करें ? क्षपणक। —( कुछ सोच कर ) उपासक ! मुहूर्त्त तो देखा। आज भद्रा तो पहर पहिले ही छूट गई है और तिथि भी सम्पूर्णचन्द्रा पौर्णमासी है और आप लोगों को उत्तर से २० दक्षिण जाना है और नक्षत्र भी दक्षिण ही है। अथ ये सूरहि चन्द के, उदये गमन प्रशस्त ।* पाइ लगन बुध केतु तौ, उदयो हू भो अस्त ॥


* भद्रा छूट गई अर्थात कल्याण को तो आप न जब चन्द्रगुप्त का पक्ष छोड़ा तभी छोड़ा और संपूर्ण चन्द्रा पौर्णमासी है अर्थात चन्द्रगुप्त का प्रताप पूर्ण व्याप्त है। उत्तर नाम प्राधान्य पक्ष छोड़ कर दक्षिण अर्थात् यम की दिशा को जाना है। नक्षत्र दक्षिण है अर्थात् आपका बाम ( विरुद्ध पक्ष ) नक्षत्र और आप का दक्षिण पक्ष [ मलयकेतु ] नक्षत्र [ बिना छत्र के ] है। अथए इत्यादि, तुम जो सूर हो उसकी

चतुर्थ अङ्क । २०१

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चतुर्थ अङ्क । २०१

राक्षस ।—अजी, पहिले तो तिथि ही नही शुद्ध है । क्षपणक ।— उपासक ! एक गुनी तिथि होत है, त्यौं चौगुन नक्षत्र । लगन होत चौतिस गुनो, यह भाखत सब पञ्ज ॥ लगन होत ह शुभ लगन, छोड़ि क्रूर ग्रह एक । जाहु चन्द्र बल देखि कै, पावहु लाभ अनेक ॥ × राक्षस ।—अजी, तुम और जोतिषियों से जा कर झगड़ो ॥ क्षपणक ।—आप ही झगड़िये, मै जाता हूं । राक्षस ।—क्या आप रूस तो नही गए ? क्षपणक ।—नही, तुम से जोतिषी नही रूसा है । १० राक्षस ।—तो कौन रूसा है ? क्षपणक ।—(आप ही आप ) भगवान्, कि तुम अपना पक्ष छोड़ कर शत्रु का पक्ष ले बैठे हो ( जाता है ) । राक्षस ।—प्रियम्वदक ! देख तो कौन समय है । प्रियम्वदक ।—जो आज्ञा ( बाहर से हो आता है ) आर्य्य ! १५ सूर्यास्त होता है ।


बुद्धि क अस्त के समय और चन्द्रगुप्त के उदय के समय जाना अच्छा है अर्थात् चाणक्य की ऐसे समय में जय होगी । लग्न अर्थात् कारण भाव में बुध चाणक्य पड़ा है इससे कतु अर्थात् मलयकेतु का उदय भी है तो भी अस्त ही होगा । अर्थात् इस युद्ध में चन्द्रगुप्त जीतेगा और मलयकेतु हारेगा । सूर अथए—इस पद से जीवसिद्धि, ने अमंगल भी किया । आश्विन पूर्णिमा तिथि, भरणी नक्षत्र, गुरुवार, मेष के चन्द्रमा मीन लग्न में उस ने यात्रा बतलायी । इस में भरणी नक्षत्र गुरुवार, पूर्णिमा तिथि यह सब दक्षिण की यात्रा में निषिद्ध हैं । फिर सूर्य्य मृत है चन्द्र जीवित है यह भी बुरा है । लग्न में मीन का बुध पड़ने से नीच का होने से बुरा है । यात्रा में नक्षत्र दक्षिण होने ही से बुरा है ।

× अर्थात् मलयकेतु का साथ छोड़ े तो तुम्हारा भला हो। वास्तव में चाणक्य के मित्र होने से जीवसिद्धि ने साहत भी उलटी दी । ज्योतिष के अनुसार अत्यन्त क्रूर वेला, क्रूर ग्रह वेध में युद्ध आरम्भ होना चाहिये । उसके विरुद्ध सौम्य समय में युद्धयात्रा कही, जिसका फल पराजय है ।

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१०२ मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—( आसन से उठ कर और देख कर ) अहा ! भगवान् सूर्य्य अस्ताचल को चले—

जब सूरज उदयो प्रबल, तेज धारि आकास । ता उपबन तरुवर सबै, छायाजुत* भे पास ॥ दूर परे ते तरु सबै, अस्त भये रवि ताप । जिमि धन बिन स्वामिहि तजै, भृत्य स्वारथी आप ॥

( दोनों जाते है )

इति चतुर्थोऽङ्क ।


* छाया के साथ ।

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पंचम अंक

( हाथ मे मोहर, गहने की पेटी और पत्र लेकर सिद्धार्थक आता है )

सिद्धार्थक।— अहाहा !
देशकाल के कलश से, सिंची बुद्धि-जल जौन।
लता नीति चाणक्य की, बहु फल दैहै तौन ॥ ५

अमात्य राक्षस के मोहर का, आर्य्य चाणक्य का लिखा हुआ यह लेख और मोहर तथा यह आभूषण की पेटिका लेकर मै पटने जाता हूं ( नेपथ्य की ओर देख कर ) अरे ! यह क्या क्षपणक आता है ? हाय हाय ! यह तो बुरा असगुन हुआ। तो मै सूरज को देख कर इस का दोष छुड़ा लूं। १०

( क्षपणक आता है )

क्षपणक।— नमो नमो अर्हन्त कों, जे। निज बुद्धि प्रताप ।
लोकोत्तर की सिद्धि सब, करत हस्तगत आप ॥
सिद्धार्थक।— भदन्त ! प्रणाम ।
क्षपणक।— उपासक ! धर्म्म लाभ हो ( भली भांति देख १५ कर ) आज तो समुद्र पार होने का बड़ा भारी उद्योग कर रक्खा है।
सिद्धार्थक।— भदन्त ! तुम ने कैसे जाना ?
क्षपणक।— इस मे छिपी कौन बात है ? जैसे समुद्र मे नाव पर सब के आगे मार्ग दिखानेवाला मांझी रहता है, वैसे २० ही तेरे हाथ मे यह लखौटा है।
सिद्धार्थक।— अजी भदन्त ! भला यह तुम ने ठीक जाना कि मैं परदेश जाता हूं, पर यह कहो कि आज दिन कैसा है ?

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१०८ मुद्राराक्षस-

क्षपणक ।—(हस कर) वाह श्रावक वाह ! तुम मूड मुंड कर भा नक्षत्र पूछते हो ?

सिद्धार्थक ।—भला अब क्या बिगडा है ? कहते क्यों नही दिन अच्छा होगा जायगे, न अच्छा होगा फिर आवेंगे।

५ क्षपणक ।—चाहे दिन अच्छा हो या न अच्छा हो, मलयके के कटक से बिना मोहर भए कोई जाने नही पाता।

सिद्धार्थक ।—यह नियम कब से हुआ ?

क्षपणक ।—सुनो, पहिले तो कुछ भी रोक टोक नही थी पर जब से कुसुमपुर के पास आए है तब से यह नियम

१० हुआ है कि बिना मोहर के न कोई जाय न आवै । इस से जो तुम्हारे पास भागुरायण का मोहर हो तो जाओ नही तो चुप बेठ रहो, क्योंकि पीछे से तुम्हें हाथ पैर बधवाना पड़ै ।

सिद्धार्थक ।—क्या यह तुम नही जानते कि हम राक्षस के

१५ अन्तरङ्ग खेलाडी मित्र हैं ? हमें कौन रोक सकता है ?

क्षपणक ।—चाहे राक्षस के मित्र हो चाहे पिशाच के, बिन मोहर के कभी न जाने पाओगे।

सिद्धार्थक ।—भदन्त ! क्रोध मत करो, कहो कि का सिद्ध हो।

२० क्षपणक ।—जाओ, काम सिद्ध होगा, हम भी पटने जाने हेतु मलयकेतु से मोहर लेने जाते हैं।

(दोनों जाते हैं)

॥ इति प्रवेशक ॥

(भागुरायण और सेवक आते हैं)

२५ भागुरायण ।—(आपही आप) चाणक्य की नीति भी बह विचित्र है।