BharatKosha
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 161 of 770

Read in context
Page 161

* पूर्वभाग-प्रथम पाद * १५९


जीवको मोक्ष प्रदान करते हैं¹। अतः इहलोक और परलोकमें सुख चाहनेवाला मनुष्य अनन्त, अपराजित श्रीनारायणदेवका भक्तिपूर्वक पूजनकरे। जो इस उपाख्यानको पढ़ता अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।

भगवान् विष्णुके भजन-पूजनकी महिमा

श्रीसनकजी कहते हैं—विप्रवर नारद! अब पुनः भगवान् विष्णुका माहात्म्य सुनो; वह सर्व-पापहारी, पवित्र तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला है। अहो! संसारमें भगवान् विष्णुकी कथा अद्भुत है। वह श्रोता, वक्ता तथा विशेषतः भक्तजनोंके पापोंका नाश और पुण्यका सम्पादन करनेवाली है। जो श्रेष्ठ मानव भगवद्भक्तिका रसास्वादन करके प्रसन्न होते हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। उनका सङ्ग करनेसे साधारण मनुष्य भी मोक्षका भागी होता है। मुनिश्रेष्ठ! जो संसार-सागरके पार जाना चाहता हो, वह भगवद्भक्तोंके भक्तोंकी सेवा करे, क्योंकि वे सब पापोंको हर लेनेवाले हैं। दर्शन, स्मरण, पूजन, ध्यान अथवा प्रणाममात्र कर लेनेपर भगवान् गोविन्द दुस्तर भवसागरसे उद्धार कर देते हैं। जो सोते, खाते, चलते, ठहरते, उठते और बोलते हुए भी भगवान् विष्णुके नामका चिन्तन करता है, उसे प्रतिदिन बारम्बार नमस्कार है। जिनका मन भगवान् विष्णुकी भक्तिमें अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियोंके लिये भीदुर्लभ मुक्ति उन भक्तोंके हाथमें ही रहती है²।<br><br>विप्रवर नारद! जानकर या बिना जाने भी जो लोग भगवान्‌की पूजा करते हैं, उन्हें अविनाशी भगवान् नारायण अवश्य मोक्ष देते हैं। सब भाई-बन्धु अनित्य हैं। धन-वैभव भी सदा रहनेवाला नहीं है और मृत्यु सदा समीप खड़ी रहती है—यह सोचकर धर्मका संचय करना चाहिये³। मूर्खलोग मदसे उन्मत्त होकर व्यर्थ गर्व करते हैं। जब शरीरका ही विनाश निकट है तो धन आदिकी तो बात ही क्या कही जाय ? तुलसीकी सेवा दुर्लभ है, साधु पुरुषोंका सङ्ग दुर्लभ है और सम्पूर्ण भूतोंके प्रति दयाभाव भी किसी विरलेको ही सुलभ होता है। सत्सङ्ग, तुलसीकी सेवा तथा भगवान् विष्णुकी भक्ति—ये सभी दुर्लभ हैं। दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर विद्वान् पुरुष उसे व्यर्थ न गँवाये। जगदीश्वर श्रीहरिकी पूजा करे। द्विजोत्तम ! इस संसारमें यही सार है। मनुष्य यदि दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहता है तो वह भगवान्‌के भजनमें तत्पर हो जाय। यही रसायन

१. पूजितो नमितो वापि संस्मृतो वापि मोक्षदः। नारायणो जगन्नाथो भक्तानां मानवर्द्धनः॥
(ना० पूर्व० ३८।५७)

२. संसारसागरं तर्तुं य इच्छेन्मुनिपुङ्गव। स भजेद्धरिभक्तानां भक्तान्वै पापहारिणः॥
दृष्टः स्मृतः पूजितो वा ध्यातः प्रणमितोऽपि वा। समुद्धरति गोविन्दो दुस्तराद् भवसागरात्॥
स्वपन् भुञ्जन् व्रजंस्तिष्ठन्नुत्तिष्ठंश्च वदंस्तथा। चिन्तयेद्यो हरेर्नाम तस्मै नित्यं नमो नमः॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं विष्णुभक्तिरतात्मनाम्। येषां मुक्तिः करस्थैव योगिनामपि दुर्लभा॥
(ना० पूर्व० ३९।५–८)

३. अनित्या बान्धवाः सर्वे विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः॥
(ना० पूर्व० ३९।४९)