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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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  • संक्षिप्त नारदपुराण *

करता हूँ)। तेजान्+सि=तेजांसि (तेज), मन्+स्यते=मंस्यते^१ (मानेंगे)। गं+गा=गङ्गा^२ (देव-नदी गङ्गा)।

मुनीश्वर नारद! यहाँतक व्यञ्जन-सन्धिका वर्णन हुआ। अब विसर्ग-सन्धि प्रारम्भ करते हैं। हरिः+छेत्ता= हरिश्चेत्ता (श्रीहरि बन्धन काटनेवाले हैं)। अमरः+शिवः= अमरश्शिवः^३ (भगवान् शिव अमर हैं) ॥ ३२॥

राम काम्यः कृपःपूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि। रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता दृष्टा इमा यतः॥ ३३॥

रामः+काम्यः=राम काम्यः (श्रीराम कमनीय हैं)। कृपः+पूज्यः=कृप पूज्यः^४ (कृपाचार्य पूज्य हैं)। पूज्यस्+अर्च्यः=पूज्योऽर्च्यः^५ (पूजनीय और अर्चनीय)। रामस्+दृष्टः=रामो दृष्टः^६ (राम देखे गये हैं)। अबलास्+अत्र=अबला अत्र (यहाँ अबलाएँ हैं)। सुप्तास्+दृष्टाः=सुप्ता दृष्टाः (सोयी देखी गयीं)। इमास्+अतः=इमायतः^७ (ये स्त्रियाँ हैं, अतः) ॥ ३३॥

विष्णुर्नम्यो रविरयं गी ≍ फलं प्रातरच्युतः। भक्तैर्वन्द्योऽप्यन्तरात्मा भो भो एष हरिस्तथा। एष शार्ङ्गी सैष रामः संहितैवं प्रकीर्तिता ॥३४॥

विष्णुः+नम्यः=विष्णुर्नम्यः (श्रीविष्णु प्रणामके योग्य हैं)। रविः+अयम्=रविरयम् (ये सूर्य हैं) गीः+फलम्=गीष्फलम् (वाणीका फल)। प्रातर्+अच्युतः=प्रातरच्युतः (प्रातःकाल श्रीहरि)। भक्तैस्+वन्द्यः=भक्तैर्वन्द्यः (भक्तजनोंके द्वारा वन्दनीय हैं)। अन्तर्+आत्मा=अन्तरात्मा (जीवात्मा या अन्तर्यामी परमात्मा)। भोस्+भोः=भो भोः (हे हे)—ये सब उदाहरण पूर्वोक्त नियमोंसे ही बन जाते हैं। एषस्+हरिः=एष हरिः (ये श्रीहरि हैं)। एषस्+शार्ङ्गी=एष शार्ङ्गी (ये शार्ङ्गधारी हरि हैं)। सस्+एषस्+रामः=सैष


१. यहाँ अपदान्त न् का अनुस्वार हुआ है। नियम यह है कि झल् परे रहनेपर अपदान्त न् म् का अनुस्वार होता है। झल्‌में इतने अक्षर आते हैं—झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह। २. यहाँ अपदान्त अनुस्वारका परसवर्ण हुआ है। र, श, ष, स, ह—इनको छोड़कर कोई भी हल् अक्षर परे रहनेपर अपदान्त अनुस्वारका नित्य परसवर्ण (परवर्ती अक्षरके वर्गका पञ्चम वर्ण) होता है—यह नियम है। ३. इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होकर श्चुत्व सन्धिका नियमसे तालव्य 'श्' हो गया। नियम यह है कि विसर्गके स्थानमें स् हो जाता है खर् परे रहनेपर। उपर्युक्त अक्षरोंमें 'ख' से 'स' तकके अक्षरोंको खर कहते हैं। ४. यहाँ विसर्गके स्थानमें ऐसा ≍ चिह्न हो गया है। विसर्गके बाद क, ख, या प, फ होनेपर विसर्गकी यह अवस्था होती है। ५. यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु' होकर 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है। फिर गुणसन्धिका नियमसे ओकार होनेपर 'अर्च्यः' के अकारका पूर्वरूप हो गया है। यहाँ नया नियम यह जानना है कि पदान्त 'स्' के स्थानमें 'रु' होता है और अप्लुत अकारसे परे होनेपर उस 'रु' का 'उ' हो जाता है। ऐसा तभी होता है, जब उस 'रु' के बाद भी कोई अप्लुत अकार या 'हश्' हो। ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—इन अक्षरोंके समुदायको 'हश्' कहते हैं। ६. यहाँ अभी बताये गये नियमके अनुसार 'स' को 'रु' करके फिर उसका उत्व हुआ। तत्पश्चात् गुण होकर 'रामो' बना। ७. इन सब उदाहरणोंमें 'स्' के स्थानमें पूर्ववत् 'रु' होता है; फिर 'रु' के स्थानमें 'य्' होकर पूर्व दो उदाहरणोंमें उसका लोप हो जाता है। और अन्तिम उदाहरणमें 'य्' 'अ' में मिल जाता है। यहाँ स्मरण रखने योग्य नियम यह है—भो, भगो, अघो तथा अवर्णपूर्वक 'रु' के स्थानमें 'य्' होता है अश् परे रहनेपर। और हल् परे रहनेपर उस 'य्'का लोप हो जाता है। सम्पूर्ण स्वरवर्ण तथा ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—ये सभी अक्षर 'अश्' के अन्तर्गत हैं।

८. एतत् और तत् शब्दोंसे परे 'सु' विभक्तिके 'स' कारका लोप हो जाता है हल् परे रहनेपर। इस नियमके अनुसार यहाँ 'स्' का लोप हो गया है।