संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| २४४ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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प्रत्यय, इयादेश तथा 'कि'-भाव करनेसे कियान् बनता है। इसका अर्थ है—'कितना' ॥ ५४॥
जातार्थे तुन्दिलः श्रद्धालौरुन्नत्ये तु दन्तुरः ।
स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥ ५५ ॥
अब जातार्थमें होनेवाले प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं। तुन्दः संजातः अस्य तुन्दिलः। जिसको तोंद हो जाय, उसे 'तुन्दिल' कहते हैं। तुन्द+इल = तुन्दिल। श्रद्धा संजाता अस्य इति श्रद्धालुः। श्रद्धा+आलु। (इसी प्रकार दयालु, कृपालु आदि बनते हैं।) दाँतोंकी ऊँचाई व्यक्त करनेके लिये दन्त शब्दसे उर-प्रत्यय होता है। उन्नताः दन्ता अस्य इति दन्तुरः (ऊँचे दाँतवाला)। अस्, माया, मेधा तथा स्रज्—इन शब्दोंसे अस्त्यर्थमें विन् प्रत्यय होता है। इनके उदाहरण क्रमसे तपस्वी, मायावी, मेधावी (बुद्धिमान्) और स्रग्वी हैं। स्रग्वीका अर्थ माला धारण करनेवाला है ॥ ५५ ॥
वाचालश्चैव वाचाटो बहुकुत्सितभाषिणि ।
ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥ ५६ ॥
खराब बातें अधिक बोलनेवालेके अर्थमें वाच् शब्दसे 'आल' और 'आट' प्रत्यय होते हैं। कुत्सितं बहु भाषते इति वाचालः, वाचाटः। ईषत् (अल्प) और असमाप्तिके अर्थमें कल्पप्, देश्य और देशीय प्रत्यय होते हैं ॥ ५६ ॥
कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा।
पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥ ५७ ॥
वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने ।
प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृन्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥ ५८ ॥
जैसे—ईषत् ऊनः कविः कविकल्पः, कविदेश्यः, कविदेशीयः। जहाँ प्रकार बतलाना हो, वहाँ किम् और सर्वनाम आदि शब्दोंसे 'था' प्रत्यय होता है। तेन प्रकारेण तथा। तत्+था=तथा। त्यदादि शब्दोंका अन्तिम हल् निवृत्त होकर वे अकारान्त हो जाते हैं, विभक्ति परे रहनेपर। (था, दा, त्र, तस् आदि प्रत्यय विभक्तिरूप माने गये हैं)। इस नियमके अनुसार तत्के स्थानमें त हो जानेसे 'तथा' बना। जहाँ किसी विशेष प्रकारके व्यक्तिका प्रतिपादन हो, वहाँ जातीय प्रत्यय होता है। यथा—पटुप्रकारः—पटुजातीयः। पटु-शब्दसे जातीय प्रत्यय हुआ। किसीकी हीनता प्रकाशित करनेके लिये संज्ञाशब्दसे पाश प्रत्यय होता है। जैसे—कुत्सितो वैद्यः वैद्यपाशः (खराब वैद्य)। प्रशंसा-अर्थमें रूप प्रत्यय होता है। यथा—प्रशस्तो वैद्यः वैद्यरूपः (उत्तम वैद्य)। मुनिवर नारदजी ! भूतपूर्व अर्थको व्यक्त करनेके लिये चर प्रत्यय होता है। यथा—पूर्वं दृष्टो दृष्टचरः (पहलेका देखा हुआ)।
प्राचुर्य (अधिकता) और विकारार्थ आदि व्यक्त करनेके लिये मय प्रत्यय होता है। जैसे—अन्नमयो यज्ञः। जिसमें अधिक अन्न व्यय किया जाय, वह अन्नमय यज्ञ है। यहाँ अन्न-शब्दसे मयट् प्रत्यय हुआ। इसी प्रकार मृन्मयः अश्वः (मिट्टीका घोड़ा) तथा स्त्रीमयः पुरुषः इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये ॥ ५७-५८ ॥
जातार्थे लज्जितोऽत्यर्थे श्रेयाञ्छ्रेष्ठश्च नारद।
कृष्णतरः शुक्लमः किम् आख्यानतोऽव्ययात् ॥ ५९ ॥
किन्तरां चैवातितरामपि ह्युच्चैस्तरामपि।
परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्वयसमित्यपि ॥ ६० ॥
जात-अर्थमें तारकादि शब्दोंसे इत प्रत्यय होता है। यथा—लज्जा संजाता अस्य इति लज्जितः* (जिसके मनमें लज्जा पैदा हो गयी हो, उसे लज्जित कहते हैं)। नारदजी ! यदि बहुतोंमेंसे किसी एककी अधिक विशेषता बतानी हो तो तम और इष्ठ प्रत्यय होते हैं और दोमेंसे एककी विशेषता बतलानी हो तो तर और ईयसु प्रत्यय होते हैं। ईयसुमें उकार इत्संज्ञक है। अयम् एषां अतिशयेन प्रशस्यः
* ईकार और तद्धित परे रहनेपर असंज्ञक इवर्ण और अवर्णका लोप हो जाता है, इस नियमके अनुसार 'लज्जा+इत' इस स्थितिमें 'अ'का लोप हो जाता है।