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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 251 of 770

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Page 251
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४९

अदेवीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वै।
सुनोत्सुनोत् सुनुयात्सूयादसावीदसोष्यत् तुदति च ॥७५॥
तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदत्तुदेत्तुद्याद्धि।
अतौत्सीदतोत्स्यदिति च रुणद्धि रुरोध रोद्धा रोत्स्यति वै॥७६॥
रुणद्ध्वरुणद्रुन्ध्याद्रुध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च ।
तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि॥७७॥
तन्यादतनीच्चातानीदतनिष्यत् क्रीणाति चिक्राय क्रेता
क्रेष्यति क्रीणात्विति च। अक्रीणात् क्रीणीयात्
क्रीयादक्रैषीदक्रेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता
चोरयिष्यति चोरयत्वचोरयच्चोरयेच्चोर्याद-
चूचुरदचोरयिष्यदित्येवं दश वै गणाः॥७८॥

जुहोत्यादि गणमें 'हु' धातु प्रधान है। इसका प्रयोग अग्निमें आहुति डालनेके अर्थमें या देवताको तृप्त करनेके अर्थमें होता है। इसका प्रत्येक लकारमें रूप इस प्रकार है—जुहोति। जुहाव, जुहवाञ्चकार, जुहवाम्बभूव, जुहवामास। होता। होष्यति। जुहोतु। अजुहोत्। जुहुयात्। हूयात्। अहौषीत्। अहोष्यत्। दिवादि गणमें 'दिव' धातु प्रधान है। इसके अनेक अर्थ हैं—क्रीडा, विजयकी इच्छा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। इसके रूप पूर्ववत् विभिन्न लकारोंमें इस प्रकार हैं—दीव्यति। दिदेव। देविता। देविष्यति। दीव्यतु। अदीव्यत्। दीव्येत्। दीव्यात्। अदेवीत्। अदेविष्यत्। स्वादिगणमें 'सु' धातु प्रधान है। यह मूलतः 'षूञ्' धातुके नामसे प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है अभिषव अर्थात् नहलाना, रस निचोड़ना, नहाना एवं सोमरस निकालना। रूप इस प्रकार हैं—सुनोति। सुषाव। सोता। सोष्यति। सुनोतु। असुनोत्। सुनुयात्। सूयात्। असावीत्। असोष्यत्। ये परस्मैपदके रूप हैं; आत्मनेपदमें सुनते, 'सुषुवे' इत्यादि रूप होते हैं। तुदादिगणमें 'तुद्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है पीड़ा देना। रूप इस प्रकार हैं—तुदति। तुतोद। तोत्ता। तोत्स्यति। तुदतु। अतुदत्। तुदेत्। तुद्यात्। अतौत्सीत्। अतोत्स्यत्। रुधादिगणमें 'रुध्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है—रूँधना, बाड़ लगाना, घेरा डालना या रोकना। रूप इस प्रकार हैं—रुणद्धि। रुरोध। रोद्धा। रोत्स्यति। रुणद्धु। अरुणत्। रुन्ध्यात्। रुद्ध्यात्। अरौत्सीत्। अरोत्स्यत्।१ तनादिगणमें 'तन्' धातु प्रधान है। इसका अर्थ है विस्तार करना, फैलाना; रूप इस प्रकार हैं—तनोति। ततान। तनिता। तनिष्यति। तनोतु। अतनोत्। तनुयात्। तन्यात्। अतनीत्, अतानीत्। अतनिष्यत्२। क्र्यादिमें क्री-धातु प्रधान है—जिसका अर्थ है खरीदना, एक द्रव्य देकर दूसरा द्रव्य लेना। रूप इस प्रकार हैं—क्रीणाति। चिक्राय। क्रेता। क्रेष्यति। क्रीणातु। अक्रीणात् क्रीणीयात्। क्रीयात्। अक्रैषीत्३। अक्रेष्यत्। चुरादिगणमें 'चुर्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है चुराना; रूप इस प्रकार हैं—चोरयति। चोरयामास, चोरयाञ्चकार, चोरयाम्बभूव। चोरयिता। चोरयिष्यति। चोरयतु। अचोरयत्। चोरयेत्। चोर्यात्। अचूचुरत्। अचोरयिष्यत्४। इस प्रकार ये धातुओंके दस गुण माने गये हैं॥७४-७८॥

प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति।
क्रियासमभिहारे तु पण्डितो बोभूयते मुने॥७९॥


१. यह उभयपदीय धातु है। मूलमें केवल परस्मैपदीय रूप दिया गया है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—रुन्धे। रुरुधे। रोद्धा। रोत्स्यते। रुन्धाम्। अरुन्ध। रुन्धीत। रोत्सीष्ट। अरुद्ध। अरोत्स्यत।
२. यह भी उभयपदीय धातु है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—तनुते। तेने। तनिता। तनिष्यते। तनुताम्। अतनुत। तन्वीत। तनिषीष्ट। अतत, अतनिष्ट। अतनिष्यत।
३. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—क्रीणीते। चिक्रिये। क्रेता। क्रेष्यते। क्रीणीताम्। अक्रीणीत। क्रीणीत। क्रेषीष्ट। अक्रेष्ट। अक्रेष्यत।
४. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—चोरयते। चोरयाञ्चक्रे, चोरयामासे, चोरयाम्बभूवे। चोरयिता। चोरयिष्यते। चोरयताम्। अचोरयत। चोरयेत। चोरयिषीष्ट। अचूचुरत। अचोरयिष्यत।