BharatKosha
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 296 of 770

Read in context
Page 296

२९४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

में शर जोड़कर १० से गुणा करे। फिर ग्रासमानसे गुणा करके गुणनफलका जो मूल हो उसमें अपना षष्ठांश घटाकर शेषमें चन्द्र-विम्बसे भाग देनेपर लब्धि-प्राप्त घटी आदिको स्थित्यर्थ^१ समझे। इस स्थित्यर्थको दो स्थानोंमें रखे। व्यगु (व्यग्वर्क—राहु घटाया हुआ सूर्य) यदि ६ या १२ राशिसे ऊन हो तो द्विगुणित व्यगु भुजांशतुल्य पलको प्रथम स्थानगत स्थित्यर्थमें घटावे और द्वितीय स्थानवालेमें जोड़े। यदि व्यगु ६ या १२ से अधिक हो तो विपरीत क्रमसे (प्रथम स्थानमें जोड़ने और द्वितीय स्थानमें घटानेसे) स्पर्श और मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्थ होते हैं^२॥ १५१-१५४॥<br>ग्रासे नखाहते छाद्यमानाप्ते स्युर्विंशोपकाः।<br>पूर्णांन्तं मध्यमत्र स्याद्धर्द्धान्तेऽङ्गं त्रिभोनकम्॥ १५५॥<br>पृथक् तत्क्रान्त्यक्षभागसंस्कृतौ स्युर्नतांशकाः।<br>तद् द्विद्व्यंशकृतिर्द्विघ्नी द्व्यूनाथार्कयुता हरः॥ १५६॥त्रिभोनाङ्कार्कविश्लेषांशाशोनघ्नाः पुरन्दराः।<br>हराप्ता लम्बनं स्वर्णं वित्रिभेऽर्काधिकोनके॥ १५७॥<br>विश्वघ्नलम्बनकलाद्योनस्तु तिथिवद् व्यगुः।<br>शरोऽतो लम्बनं षड्घ्नं तल्लवाद्योनवित्रिभात्॥ १५८॥<br>नतांशास्तद्दशांशोनघ्ना धृत्यस्तद्विवर्जिताः।<br>साष्टेन्देलिमैः षड्भिस्तु भक्ता नतिर्नतांशदिक् ॥ १५९॥<br>तयोनाढ्यो हि भिन्नैकदिक् शरःस्फुटतां व्रजेत्।<br>ततश्छन्नस्थितिदले साध्ये स्थित्यर्थषड्ढतिः॥ १६०॥<br>अंशास्तैर्वित्रिभं द्विघ्नं रहितं सहितं क्रमात्।<br>विधाय ताभ्यां संसाध्ये लम्बने पूर्ववत्तयोः॥ १६१॥<br>पूर्वोक्ते संस्कृते ताभ्यां स्थित्यर्द्धे भवतः स्फुटे।<br>ताभ्यां हीनयुतो मध्यदर्शः कालौ मुखान्तगौ॥ १६२॥<br>(ग्रहणका विंशोपक (बिस्वा) फल-)<br>अङ्गुलादि ग्रासमानको २० से गुणा करके गुणनफलमें अङ्गुलात्मक छाद्यमानसे भाग दे, जो लब्धि आवे, वह विंशोपक फल होता है^३।

'सूर्यकी गतिको २ से गुणा करके गुणनफलमें ११ से भाग देनेपर जो लब्धि आवे, उतना ही सूर्यका अङ्गुलादि विम्बमान होता है तथा चन्द्रमाकी गतिकलामें ७४ से भाग देनेपर जो लब्धि हो, उतने अङ्गुलादि चन्द्रविम्बका मान होता है। चन्द्रमाकी गतिमें ७१६ घटाकर शेषमें २२ से भाग देनेपर लब्धिको ३२ में जोड़ें; फिर उसमें सूर्यगतिके सप्तमांशको घटानेसे भूभा (पृथ्वीकी छाया) होती है।'

यथा—स्पष्ट सूर्यगति ६१।११ और चन्द्रगति ८२४।५ है तो उक्त रीतिसे सूर्यगतिके द्विगुणित १२२।२२ में ११ से भाग देनेपर भागफल ११।७ सूर्यविम्ब हुआ। तथा चन्द्रगति ८२४।५ में ७४ से भाग देनेपर भागफल ११।८ चन्द्रविम्ब हुआ। चन्द्रगति ८२४।५ में ७१६ घटाकर शेष १०८।५ में २२ से भाग देनेपर लब्धि ४।५५ में ३२ जोड़नेसे ३६।५५ हुआ; इसमें सूर्यगति ६१।११ का सप्तमांश ८।४४ घटानेसे शेष २८।११ भूभाका विम्ब हुआ। अब छाद्य (चन्द्र) और छादक (भूभा)-के विम्बके योग ११।८+२८।११=३९।१९ के आधे १९।३९ में पूर्वसाधित शर २।५० को घटानेसे शेष १६।४९ ग्रासमान हुआ; यह छाद्य (चन्द्र) विम्बसे अधिक है, अतः इसमें चन्द्रविम्ब ११।८ को घटानेसे शेष ५।४१ खग्रास हुआ।

१. स्पर्शकालसे मोक्षकालका जो अन्तर है, उसे स्थिति कहते हैं। अतः उसका आधा मध्यम स्थित्यर्थ कहलाता है। स्पर्शकालसे मध्यकालतक स्पर्शस्थित्यर्थ और मध्यकालसे मोक्षकालतक मोक्षस्थित्यर्थ कहलाता है।

२. जैसे—छाद्य (चन्द्र) और छादक (भूभा)-के विम्बयोग ३९।१९ के आधे १९।३९ में शर २।५० को जोड़नेपर २२।२९ हुआ; इसको १० से गुणा करनेसे गुणनफल २२४।५० को ग्रासमान १६।४९ से गुणा करनेपर ३७८०।५६।५० हुआ। इसके मूल ६१।२९ में अपने ही षष्ठांश १०।१५ को घटानेपर शेष ५१।१४ में चन्द्रमाके विम्ब ११।८ का भाग दिया तो लब्धि घट्यादि पल ४।३६ स्थित्यर्थ हुआ।

व्यगुभुजांश १।४८।४८ को २ से गुणा करनेपर गुणनफल ३।३७।३६ पल अर्थात् स्वल्पान्तरसे ४ पल हुए। इन पलोंको व्यगु (राहु घटे हुए सूर्य)-के ०=१२ राशिसे अधिक होनेके कारण स्थित्यर्थ ४।३६ में जोड़नेसे स्पर्शस्थित्यर्थ ४।४० और स्थित्यर्थमें ४ पल घटानेसे ४।३२ मोक्षस्थित्यर्थ हुआ।

३. जैसे—ग्रासमान १६।४९ को २० से गुणा करनेपर गुणनफल ३३६।२० में छाद्यमान ११।८ से भाग दिया तो लब्ध ग्रहणविंशोपक बल ३०।१३ हुआ। जब विंशोपक २० होता है तो ग्रहणका पुराणोक्त साधारण फल होता