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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 405 of 770

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Page 405
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०३

'वंशपत्रपतित' (में भगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। दस-सात अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ऽ। ।ऽ। ऽ। ।।ऽ ।। ।।।।ऽ अद्य कुरुष्व कर्म सुकृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव॥ 'मन्दाक्रान्ता' (में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु होते हैं। ४, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। (इसके प्रत्येक चरणके अन्तिम सात अक्षर कम कर देनेपर 'हंसी' छन्द बन जाता है।) उदाहरण— ऽऽऽऽ ।।।।।ऽ ऽ।ऽ ऽ।ऽऽ बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥ 'शिखरिणी' (-में यगण, मगण, सगण, नगण, भगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं तथा ६, ११ अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ।ऽऽ ऽऽ ऽ ।।।।।ऽ ऽ।।।ऽ महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः। अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ (१८) अठारह-अठारह अक्षरोंके चार चरणोंसे बननेवाले छन्द-समूहकी संज्ञा 'धृति' कही गयी है। प्रस्तारसे इसके २६२१४४ भेद होते हैं। उनमेंसे एक ही भेद 'कुसुमितलतावेल्लिता' नामक छन्दका लक्षण और उदाहरण दिया जाता है। इसमें मगण, तगण, नगण और तीन भगण होते हैं। ५, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽऽऽ ।।।।। ऽऽ। ऽऽ। ऽऽ धन्यानामेताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजत्परभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझङ्कारम्या ग्रामान्तःस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयान्ति॥ (१९) उन्नीस-उन्नीस अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायको 'विधृति' या 'अतिधृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके ५२४२८८ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'शार्दूलविक्रीडित' नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण और एक गुरु होते हैं तथा बारह और सात अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽ ।।ऽ ।ऽ ।।। ऽ ऽऽ। ऽऽ । ऽ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥ (२०) बीस-बीस अक्षरोंके चार पादोंसे निष्पन्न होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'कृति' है। प्रस्तारसे इसके १०४८५७६ भेद होते हैं। उनमेंसे २के लक्षण और उदाहरण यहाँ बतलाये जाते हैं। पहलेका सुवदना और दूसरेका नाम 'वृत्त' है। सुवदनामें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। ७, ७, ६ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ ऽऽऽ ।ऽऽ ।। ।।।। ऽऽऽ ।। ।ऽ या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगकालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजियिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने प्रत्यक्षं पार्वती मे भवतु भगवती स्नेहात्सुवदना॥ 'वृत्त' (में एक गुरु, एक लघुके क्रमसे २० अक्षर होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।) उदाहरण— ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । ऽ। ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । जन्तुमात्रदुःखकारि कर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनां हिताय॥ (२१) इक्कीस-इक्कीस अक्षरोंके चार पादोंमें पूर्ण होनेवाले छन्दोंकी जातिवाचक संज्ञा 'प्रकृति' है। प्रस्तारसे इसके २०९७१५२ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'स्रग्धरा' के नामसे प्रसिद्ध है। इसमें मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगण