संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 407 of 770
Read in context| * पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ४०५ |
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संज्ञाएँ हैं, प्रस्तारसे^१ इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षरवाले पादमें प्रथम गुरुके नीचे लघु लिखना चाहिये, फिर दाहिनी ओरकी पङ्क्तिको ऊपरकी पङ्क्तिके समान भर दे। तात्पर्य यह कि शेष स्थानोंमें ऊपरके अनुसार गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रियाको बराबर करता जाय। इसे करते हुए ऊनस्थान अर्थात् बायीं ओरके शेष स्थानमें गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक कि सभी लघु अक्षरोंकी प्राप्ति न हो जाय। इसे 'प्रस्तार' कहा गया है^२॥१४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जानेपर यदि उसके किसी भेदका स्वरूप जानना हो तो उसे जाननेकी विधिको 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं।) यदि नष्ट अङ्क सम है | तो उसके लिये एक लघु लिखे और उसका आधा भी यदि सम हो तो उसके लिये पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अङ्क विषम हो तो उसके लिये एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़कर आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिये भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक अभीष्ट अक्षरोंका पाद प्राप्त न हो जाय^३। (प्रस्तारके किसी भेदका स्वरूप तो ज्ञात हो; किंतु संख्या ज्ञात न हो तो उसके जाननेकी विधिको 'उद्दिष्ट' कहते हैं।) उद्दिष्टमें गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें पहले अक्षरपर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरोंपर दूने अङ्क लिखता जाय; फिर लघुके ऊपर जो अङ्क हों,
उदाहरण—
ऽऽऽऽऽऽऽऽ ।।।।।।।।।ऽ ऽऽ ।। ऽ ।ऽ
हेलोदञ्चन्यञ्चत्पादप्रकटविकटनटनभरो रणत्करतालकः चारुप्रेङ्खच्चूडाबर्हः श्रुतितरलनवकिसलयस्तरङ्गितहारधृत्।
त्रस्यत्रागस्त्रीभिर्भक्त्या मुकुलितकरकमलयुगं कृतस्तुतिरच्युतः पायाद्वश्चिन्दन् कालिन्दीह्रदकृतनिजवसतिबृहद् भुजङ्गविजृम्भितम्॥
'अपवाह' (-के प्रत्येक पादमें १ मगण, ६ नगण, १ सगण, २ गुरु होते हैं। ९, ६, ६, ५ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण—
ऽऽऽ ।।।।।।।।।।।।।।।।ऽ ऽऽ
श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणसकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम्।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम्॥
१. छन्दःशास्त्रमें छः प्रत्यय होते हैं—१- प्रस्तार, २- नष्ट, ३- उद्दिष्ट, ४- एकद्व्यादिलगक्रिया, ५- संख्यान और छठा अध्वयोग। प्रस्तारका अर्थ फैलाव; अमुक संख्यायुक्त अक्षरोंसे बने हुए पादवाले छन्दके कितने और कौन-कौनसे भेद हो सकते हैं? इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्रस्तार है। नष्ट आदिका स्वरूप आगे बतायेंगे।
२. उदाहरणके लिये चार अक्षरके पादवाले छन्दका मूलोक्त रीतिसे प्रस्तार अङ्कित किया जाता है—
| १—ऽऽऽऽ | ९—ऽऽऽ। |
| २—।ऽऽऽ | १०—।ऽऽ। |
| ३—ऽ।ऽऽ | ११—ऽ।ऽ। |
| ४—।।ऽऽ | १२—।।ऽ। |
| ५—ऽऽ।ऽ | १३—ऽऽ।। |
| ६—।ऽ।ऽ | १४—।ऽ।। |
| ७—ऽ।।ऽ | १५—ऽ।।। |
| ८—।।।ऽ | १६—।।।। |
३. जैसे किसीके द्वारा पूछा जाय कि चार अक्षरके पादवाले छन्दका छठा भेद क्या है? तो इसमें छठा अङ्क सम हैं; अतः उसके लिये प्रथम एक लघु होगा (।), फिर छः का आधा करनेपर तीन विषम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। अब तीनमें एक जोड़कर आधा किया तो दो सम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये फिर एक लघु (।) लिखा। उस दोका आधा किया तो एक विषम अङ्क हुआ; अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। सब मिलकर (।ऽ ।ऽ) ऐसा हुआ। अतः चार अक्षरवाले छन्दके छठे भेदमें प्रत्येक पादमें प्रथम अक्षर लघु, दूसरा गुरु, तीसरा लघु और चौथा गुरु होगा।