संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 410 of 770
Read in context४०८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
रहे थे। वे बातचीतमें बड़ी चतुर तथा समस्त कलाओंमें कुशल थीं। उनकी संख्या पचाससे अधिक थी। उन सबने शुकदेवजीके लिये पाद्य, अर्घ्य आदि प्रस्तुत किये तथा देश और कालके अनुसार प्राप्त हुआ उत्तम अन्न भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया। नारदजी! जब वे भोजन कर चुके तो उनमेंसे एक-एक युवतीने शुकदेवजीको अपने साथ लेकर उन्हें वह अन्तःपुरका वन दिखलाया। फिर मनके भावोंको समझनेवाली वे सब युवतियाँ हँसती, गाती हुई उदारचित्तवाले शुकदेव मुनिकी परिचर्या करने लगीं। शुकदेवमुनिका अन्तःकरण परम शुद्ध था। वे क्रोध और इन्द्रियोंको जीत चुके थे तथा निरन्तर ध्यानमें ही स्थित रहते थे। उनके मनमें न हर्ष होता था, न क्रोध। संध्याका समय होनेपर शुकदेवजीने हाथ-पैर धोकर संध्योपासना की। फिर वे पवित्र आसनपर बैठे और उसी मोक्ष-धर्मके विषयमें विचार करने लगे। रातके पहले पहरमें वे ध्यान लगाये बैठे रहे। दूसरे और तीसरे पहरमें भगवान् शुकने न्यायपूर्वक निद्राको स्वीकार किया। फिर प्रातःकाल ब्रह्मवेलामें ही उठकर उन्होंने शौच-स्नान किया। तदनन्तर स्त्रियोंसे घिरे होनेपर भी परम बुद्धिमान् शुक पुनः ध्यानमें ही लग गये। नारदजी! इसी विधिसे उन्होंने वह शेष दिन और सम्पूर्ण रात्रि राजकुलमें व्यतीत की।
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राजा जनक पुरोहित तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंको आगे करके मस्तकपर अर्घ्यपात्र लिये गुरुपुत्र शुकदेवजीके समीप गये। उन्होंने सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एक महान् सिंहासन लेकर गुरुपुत्र शुकदेवजीको अर्पित किया। व्यासनन्दन शुक जब उस आसनपर विराजमान हुए, तब राजाने पहले उन्हें पाद्य अर्पण किया, उसके बाद अर्घ्यसहित गाय निवेदन की। महातेजस्वी द्विजोत्तम शुकने मन्त्रोच्चारणपूर्वक की हुई उस पूजाको स्वीकार करके राजाका कुशल-मङ्गल पूछा। राजाका हृदय और परिजन सभी उदार थे। वे भी गुरुपुत्रसे कुशल-समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले भूमिपर बैठे। तत्पश्चात् व्यासनन्दन शुकसे कुशल-मङ्गल पूछकर विधिज्ञ राजाने