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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 424 of 770

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Page 424

४२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


सनत्कुमारजी कहते हैं—नारद ! सुनो, मैं तुमसे भागवततन्त्रका वर्णन करूँगा। जिसे जानकर साधक निर्मल भक्तिके द्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। (अब पहले शैवतन्त्रका वर्णन करते हैं।) शैव-महातन्त्रमें तीन पदार्थ और चार पादोंका वर्णन है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। भोग, मोक्ष, क्रिया और चर्या—ये शैवमहातन्त्रमें चार पाद (साधन) कहे गये हैं। पदार्थ तीन ही हैं—पशुपति, पशु तथा पाश; इनमें एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा ही 'पशुपति' हैं और जीवोंको 'पशु' कहा गया है। नारद! देखो, जबतक स्वरूपके अज्ञानको सूचित करनेवाले मोह आदिसे सम्बन्ध बना रहता है, तबतक इन सब जीवोंकी 'पशु' संज्ञा मानी गयी है। उनका पशुत्व द्वैतभावसे युक्त है। इन पशुओंके जो पाश अर्थात् बन्धन हैं, वे पाँच प्रकारके माने गये हैं। उनमेंसे प्रत्येकका लक्षण बताया जायगा। पशुके तीन भेद हैं—'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल' और 'सकल'। इनमें प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल पशु' 'मल' संयुक्त (मलरूप पाशसे आबद्ध) होता है। दूसरा 'प्रलयाकल पशु' 'मल' और 'कर्म'—इन दो पाशोंसे संयुक्त (बद्ध) होता है। तीसरा अर्थात् 'सकल पशु' 'मल', 'माया' तथा 'कर्म'—इन तीन पाशोंसे बँधा हुआ कहा गया है। उक्त त्रिविध पशुओंमें जो पहला— विज्ञानाकल है, उसके दो भेद होते हैं—'समाप्त-कलुष' और 'असमाप्तकलुष'। दूसरे—प्रलयाकल पशुके लिये भी दो भेद कहे गये हैं—'पक्व-मल' और 'अपक्व-मल' (अर्थात् पक्वपाशद्वय और अपक्व पाशद्वय)। विज्ञानाकल और प्रलयाकल ये दोनों जीव (पशु) शुद्ध मार्गपर स्थित होते हैं और सकल जीव कला आदि तत्त्वोंके अधीन होकर विभिन्न लोकोंमें कर्मानुसार प्राप्त हुए तिर्यक्-मनुष्यादि शरीरोंमें भ्रमण करता है। पाश पाँच प्रकारके बताये गये हैं—'मलज', 'कर्मज', 'मायेय' (मायाजन्य), 'तिरोधानशक्तिज' और 'विन्दुज'। जैसे भूसी चावलको ढके रहती है, उसी प्रकार एक भी 'मल' पुरुषकी अनेक शक्ति—दृक्-शक्ति (ज्ञान) और क्रियाशक्तिका


है, वहाँ भी उनका शरीर प्राकृत नहीं है। वह निर्मल तथा कर्मादि बन्धनोंसे नित्यमुक्त होनेके कारण शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) है। उपनिषदोंमें महेश्वरके मन्त्रमय स्वरूपका वर्णन है। शैवदर्शनमें यह बात स्पष्ट शब्दोंमें कही गयी है—'मलाद्यसम्भवाच्छाक्तं वपुर्नैतादृशं प्रभोः।' 'तद्वपुः पञ्चभिर्मन्त्रैः।' इत्यादि।

पशु

जीवात्मा या क्षेत्रज्ञका ही नाम 'पशु' है। पशु उसे कहते हैं जो पाशोंद्वारा बँधा हो—'पाशनाच्च पशवः।' जीव भी पाशबद्ध है, इसीसे उसे 'पशु' कहते हैं। वह वस्तुतः अणु नहीं, व्यापक है। नित्य है। 'आत्मनो विभुनित्यता' यह शैवतन्त्रकी स्पष्ट घोषणा है; परंतु पशु (जीव) दशामें यह परिच्छिन्न और सीमित शक्तिसे युक्त है, तथापि यह 'सांख्य' के पुरुषकी भाँति अकर्ता भी नहीं है; क्योंकि पाशोंसे मुक्त होकर शिवत्वको प्राप्त हो जानेपर यह भी निरतिशय ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। पशु तीन प्रकारका है—'विज्ञानाकल', 'प्रलयाकल' तथा 'सकल'। (१) जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्मोंका क्षय कर डालता है और कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण जिसको शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता, उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं—आणव-मल, कर्मज-मल तथा मायेय-मल। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान)-द्वारा अकल—कलारहित (कलादि भोग-बन्धनोंसे शून्य) हो जाता है, इसलिये उसकी 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है। (२) जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय-मल तो नहीं रहता, परंतु आणव और कर्मज—ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकालमें ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है। (३) जिस जीवात्मामें आणव, मायेय और कर्मज—तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग-बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण 'सकल' कहा गया है।