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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 440

४३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इस सत्यके अनुसार मेरे लिये यहीं सब तीर्थ प्रदान कीजिये। गङ्गे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नर्मदे, सिन्धु, कावेरि! आप इस जलमें निवास करें।'

इस प्रकार जलमें सब तीर्थोंका आवाहन करके उन्हें सुधाबीज (वं)–से युक्त करे। फिर गोमुद्रासे उनका अमृतीकरण करके उन्हें कवचसे अवगुण्ठित करे। फिर अस्त्रमुद्राद्वारा संरक्षण करके चक्रमुद्राका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् उस जलमें विद्वान् पुरुष अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके मण्डलोंका चिन्तन करे। फिर सूर्यमन्त्र और अमृतबीजके द्वारा उस जलको अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर मूल-मन्त्रसे ग्यारह बार अभिमन्त्रित करके उसके मध्यभागमें पूजा-यन्त्रकी भावना करे और हृदयसे देवताका आवाहन करके स्नान कराकर मानसिक उपचारसे उनकी पूजा करे। इष्टदेव सिंहासनपर विराजमान हैं, इस भावनासे उन्हें नमस्कार करके विद्वान् पुरुष उस जलको प्रणाम करे—

आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतुलतेजसः।
तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम्॥
(३२। ३३)

'जल सम्पूर्ण भूतोंका और अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका आधार है। अतः वह विष्णुस्वरूप है; इसलिये मैं उसे प्रणाम करता हूँ।'

इस प्रकार नमस्कार करके साधक अपने शरीरके सात छिद्रोंको बंद करके जलमें डुबकी लगावे और उसमें मूलमन्त्रका इष्टदेवके स्वरूपमें ध्यान करे। तीन बार डुबकी लगावे और ऊपर आवे। तत्पश्चात् दोनों हाथोंको घड़ेकी मुद्रामें रखकर उसके द्वारा सिरको सींचे।

फिर श्रीशालग्रामशिलाका जल (भगवच्चरणामृत) पान करे। कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे। यह शास्त्रका नियत विधान है। तदनन्तर मन्त्रका साधक अपने इष्टदेवका सूर्यमण्डलमें विसर्जन करके तटपर आवे और यत्नपूर्वक वस्त्र धोकर दो शुद्ध वस्त्र (धोती और अँगोछा) धारण करके विद्वान् पुरुष संध्या आदि करे। रोगादिके कारण स्नानादिमें असमर्थ हो, वह वहाँ जलसे स्नान न करके अघमर्षण करे अथवा अशक्त मनुष्य भस्म या धूलसे स्नान करे। तदनन्तर शुभ आसनपर बैठकर संध्यादि कर्म करे। 'ॐ केशवाय नमः', 'ॐ नारायणाय नमः', 'ॐ माधवाय नमः' इन मन्त्रोंसे तीन बार जलका आचमन करके 'ॐ गोविन्दाय नमः', 'ॐ विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका उच्चारण करके दोनों हाथ धो ले। फिर 'ॐ मधुसूदनाय नमः', 'ॐ त्रिविक्रमाय नमः' से दोनों ओष्ठोंका मार्जन करे। तत्पश्चात् 'ॐ वामनाय नमः', 'ॐ श्रीधराय नमः' से मुख और दोनों हाथोंका स्पर्श करे। 'ॐ हृषीकेशाय नमः', 'ॐ पद्मनाभाय नमः' से दोनों चरणोंका स्पर्श करे। 'ॐ दामोदराय नमः' से मूर्धा (मस्तक) का, 'ॐ संकर्षणाय नमः' से मुखका, 'ॐ वासुदेवाय नमः', 'ॐ प्रद्युम्नाय नमः' से क्रमशः दायीं-बायीं नासिकाका स्पर्श करे। 'ॐ अनिरुद्धाय नमः', 'ॐ पुरुषोत्तमाय नमः' से पूर्ववत् दोनों नेत्रोंका तथा 'ॐ अधोक्षजाय नमः', 'ॐ नृसिंहाय नमः' से दोनों कानोंका स्पर्श करे। 'ॐ अच्युताय नमः' से नाभिका, 'ॐ जनार्दनाय नमः' से वक्षःस्थलका तथा 'ॐ हरये नमः', 'ॐ विष्णवे नमः' से दोनों कंधोंका स्पर्श करे। यह वैष्णव आचमनकी विधि है। आदिमें प्रणव और अन्तमें चतुर्थीका एकवचन तथा नमः पद जोड़कर पूर्वोक्त केशव आदि नामोंद्वारा मुख आदिका स्पर्श करना चाहिये। मुख और नासिकाका स्पर्श तर्जनी अंगुलिसे करे। नेत्रों तथा कानोंका स्पर्श अनामिकाद्वारा करे तथा नाभिदेशका स्पर्श कनिष्ठा अंगुलिसे करे। अङ्गुष्ठका स्पर्श सभी अङ्गोंमें करना चाहिये। 'स्वाहा' पद अन्तमें जोड़कर चतुर्थ्यन्त आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका उच्चारण करके जो आचमन किया जाता है, उसे शैव आचमन कहा गया है। आदिमें क्रमशः दीर्घत्रय, अनुस्वार और ह अर्थात्—हां हीं हूं जोड़कर स्वाहान्त आत्मतत्त्व विद्यातत्त्व