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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 444 of 770

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Page 444

४४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इसके हल् बीज और स्वर शक्तियाँ हैं। भृगु (स)-में स्थित आकाश (ह)-की छः दीर्घोंसे युक्त करके उसके द्वारा अङ्गन्यास करें¹। इसके बाद भगवान् शङ्करका इस प्रकार ध्यान करे। उनका श्रीविग्रह बन्धूकपुष्प एवं सुवर्णके समान है। वे अपने हाथोंमें वर, अक्षमाला, अंकुश और पाश धारण करते हैं। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट सुशोभित है। उनके तीन नेत्र हैं तथा सम्पूर्ण देवता उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं।

गाणपत्य-मातृका-न्यास

इस प्रकार शिवशक्तिका ध्यान करके अन्तमें चतुर्थी विभक्ति और नमः पद जोड़कर तथा आदिमें गणेशजीका अपना बीज लगाकर मातृकास्थलमें एक-एक मातृका वर्णके साथ शक्तिसहित गणेशजीका न्यास करे। ह्रीके साथ विघ्नेश तथा श्रीके साथ विघ्नराजका न्यास करे²। पुष्टिके साथ विनायक, शान्तिके साथ शिवोत्तम, स्वस्तिसहित विघ्नकृत्, सरस्वतीसहित विघ्नहर्ता, स्वाहासहित गणनाथ, सुमेधासहित एकदन्त, कान्तिसहित द्विदन्त, कामिनीसहित गजमुख, मोहिनीसहित निरञ्जन, नटीसहित कपर्दी, पार्वतीसहित दीर्घजिह्व, ज्वालिनीसहित शङ्कुकर्ण, नन्दासहित वृषध्वज, सुरेशीसहित गणनायक, कामरूपिणीके साथ गजेन्द्र, उमाके साथ शूर्पकर्ण, तेजोवतीके साथ विरोचन, सतीके साथ लम्बोदर, विघ्नेशीके साथ महानन्द, सुरूपिणीसहित चतुर्मूर्ति, कामदासहित सदाशिव, मदजिह्वासहित आमोद, भूतिसहित दुर्मुख, भौतिकीके साथ सुमुख, सिताके साथ प्रमोद, रमाके साथ एकपाद, महिषीके साथ द्विजिह्व, जम्भिनीके साथ शूर, विकर्णाके साथ वीर, भ्रुकुटीसहित षण्मुख, लज्जाके साथ वरद, दीर्घघोणाके साथ वामदेवेश, धनुर्धरीके साथ वक्रतुण्ड, यामिनीके साथ द्विरण्ड, रात्रिसहित सेनानी, ग्रामणीसहित कामान्ध, शशिप्रभाके साथ मत्त, लोलनेत्राके साथ विमत्त, चञ्चलाके साथ मत्तवाह, दीप्तिके साथ जटी, सुभगाके साथ मुण्डी, दुर्भगाके साथ खड्गी, शिवाके साथ वरेण्य, भगाके साथ वृषकेतन, भगिनीके साथ भक्त-प्रिय, भोगिनीके साथ गणेश, सुभगाके साथ मेघनाद, कालरात्रिसहित व्यापी तथा कालिकाके साथ गणेशाका अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये। इस प्रकार विघ्नेश-मातृकाका वर्णन किया गया है। गणेशमातृकाके गण ऋषि कहे गये हैं। निचृद् गायत्री छन्द है तथा शक्तिसहित गणेश्वर देवता हैं। छः दीर्घ स्वरोंसे युक्त गणेशबीज (गां गीं गूं गैं गों गः) के द्वारा अङ्गन्यास करके उनका इस प्रकार ध्यान करे—गणेशजी अपने चारों भुजाओंमें क्रमशः पाश, अंकुर, अभय और वर धारण किये हुए हैं, उनकी पत्नी सिद्धि हाथमें कमल ले उनसे सटकर बैठी हैं, उनका शरीर रक्तवर्णका है तथा उनके तीन नेत्र हैं, ऐसे गणपतिका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके स्वकीय बीजको पूर्वाक्षरके रूपमें रखकर उक्त मातृका-न्यास करना चाहिये।

कला-मातृका-न्यास

(अब कला-मातृका-न्यास बताया जाता है—) निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, असूक्ष्मा, अमृता, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, सृष्टि, समृद्धिका, स्मृति, मेधा, क्रान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्धि, जरा, पालिनी, क्षान्ति, ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, तीक्ष्णा, रौद्रा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा,


१. ह् सां हृदयाय नमः। ह् सीं शिरसे स्वाहा। ह् सूं शिखायै वषट्। ह् सैं कवचाय हुम्। ह् सौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्स्ः अस्त्राय फट्।
२. गं अं विघ्नेशह्रीभ्यां नमः (ललाटे), गं आं विघ्नराजश्रीभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि रूपसे वाक्ययोजना कर लेनी चाहिये।