संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 453 of 770
Read in context- पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४५१
सिवा दूसरा कोई शरण नहीं है। आप ही मेरे शरणदाता हैं। अतः करुणापूर्वक मेरी त्रुटियोंको क्षमा करें। जगत्पते! मेरे द्वारा रात-दिन सहस्रों अपराध बनते हैं। अतः 'यह मेरा दास है।' ऐसा समझकर क्षमा करें। परमेश्वर! मैं आवाहन करना नहीं जानता, विसर्जन भी नहीं जानता और पूजा करना भी अच्छी तरह नहीं जानता, अब आप ही मेरी गति हैं—सहारे हैं।'
इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्रका साधक मूलमन्त्र पढ़कर विसर्जनके लिये नीचे लिखे श्लोकका पाठ करे और पुष्पाञ्जलि दे—
गच्छ गच्छ परं स्थानं जगदीश जगन्मय।
यन्न ब्रह्मादयो देवा जानन्ति च सदाशिवः ॥ ३१८ ॥
'जगदीश! जगन्मय! आप अपने उस परम धामको पधारिये, जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा भगवान् शिव भी नहीं जानते हैं।'
इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर संहार-मुद्राके द्वारा भगवान्को उनके अङ्गभूत पार्षदोंसहित सुषुम्णा नाडीके मार्गसे अपने हृदयकमलमें स्थापित करके पुष्प सूँघकर विद्वान् पुरुष भगवान्का विसर्जन करे। दो शङ्ख, दो चक्रशिला (गोमतीचक्र), दो शिवलिङ्ग, दो गणेशमूर्ति दो सूर्यप्रतिमा और दुर्गाजीकी तीन प्रतिमाओंका पूजन एक घरमें नहीं करना चाहिये; अन्यथा दुःखकी प्राप्ति होती है। इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर भगवान्का चरणामृत पान करे—
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
सर्वपापक्षयकरं विष्णुपादोदकं शुभम् ॥ १२१-१२२॥
'भगवान् विष्णुका शुभ चरणामृत अकालमृत्युका अपहरण, सम्पूर्ण व्याधियोंका नाश तथा समस्त पापोंका संहार करनेवाला है।'
भिन्न-भिन्न देवताओंके भक्तोंको चाहिये कि वे अपने आराध्यदेवको निवेदित किये हुए नैवेद्य-प्रसादको ग्रहण करें। भगवान् शिवको निवेदित निर्माल्य—पत्र, पुष्प, फल और जल ग्रहण करने योग्य नहीं है, किंतु शालग्राम-शिलाका स्पर्श होनेसे वह सब पवित्र (ग्राह्य) हो जाता है।
पूजाके पाँच प्रकार
नारद! सबने पाँच प्रकारकी पूजा बतायी है—आतुरी, सौतिकी, त्रासी, साधनाभाविनी तथा दौर्बोधी। इनके लक्षणोंका मुझसे क्रमशः वर्णन सुनो—रोग आदिसे युक्त मनुष्य न स्नान करे, न जप करे और न पूजन ही करे। आराध्यदेवकी पूजा, प्रतिमा अथवा सूर्यमण्डलका दर्शन एवं प्रणाम करके मन्त्र-स्मरणपूर्वक उनके लिये पुष्पाञ्जलि दे। फिर जब रोग निवृत्त हो जाय तो स्नान और नमस्कार करके गुरुकी पूजा करे तथा उनसे प्रार्थना करे—'जगन्नाथ! जगत्पूज्य! दयानिधे! आपके प्रसादसे मुझे पूजा छोड़नेका दोष न लगे।' तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोंका भी पूजन करके उन्हें दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे और उनसे आशीर्वाद लेकर पूर्ववत् भगवान्की पूजा करे। यह 'आतुरी पूजा' कही गयी है। अब सौतिकी पूजा बतायी जाती है। सूतक दो प्रकारका कहा गया है—जातसूतक और मृतसूतक। दोनों ही सूतकोंमें एकाग्रचित्त हो मानसी संध्या करके मनसे ही भगवान्का पूजन और मनसे ही मन्त्रका जप करे। फिर सूतक बीत जानेपर पूर्ववत् गुरु और ब्राह्मणोंका पूजन करके उनसे आशीर्वाद लेकर सदाकी भाँति पूजाका क्रम प्रारम्भ कर दे*। यह 'सौतिकी पूजा' कही गयी। अब त्रासी पूजा बतायी जाती है। दुष्टोंसे त्रासको प्राप्त हुआ मनुष्य यथाप्राप्त उपचारोंसे अथवा मानसिक उपचारोंसे भगवान्की पूजा करे। यह 'त्रासी पूजा' कही
* तत्र ज्ञात्वा मानसीं तु कृत्वा संध्यांसमाहितः। मनसैव यजेद् देवं मनसैव जपेन्मनुम्॥
निवृत्ते सूतके प्राग्वत् सम्पूज्य च गुरुंद्विजान्। तेभ्यश्चाशिषमादाय ततो नित्यक्रमं चरेत्॥
(ना० पूर्व० तृ० ६७। १३१-१३२)