संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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सुगन्ध फैल रही है। ऐसे मनोहर कालिन्दीतटपर श्यामसुन्दर मुखसे मन्द-मन्द मुसकानकी प्रभा बिखेरते हुए बारम्बार मुरली बजा रहे हैं। उनकी अङ्गकान्ति भीतर जलसे भरे हुए नूतन मेघोंकी श्याम घटासे टक्कर ले रही है। भौंहोंका मध्यभाग कुछ चञ्चल हो उठा है। दोनों नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल हैं। लाल-लाल अधर बिम्बफलको लजा रहे हैं। भगवान्की वह झाँकी बड़ी ही सुन्दर है। माथेपर मोरपंखका मुकुट है, जिससे उनके बँधे हुए केशोंकी चोटी बड़ी सुहावनी लग रही है। उनके दोनों कपोल हिलते हुए चमकीले कुण्डलोंमें जटित रत्नोंकी किरणोंसे उद्भासित हो रहे हैं और उन कपोलोंसे श्यामसुन्दरका सौन्दर्य और भी बढ़ गया है। वे करधनी, नूपुर, हार, कंगन और सुन्दर भुजबंद आदि आभूषणोंसे विभूषित हो प्रत्येक दो गोपीके बीचमें खड़े होकर अपनी मनमोहिनी झाँकी दिखा रहे हैं। गलेमें वन्यपुष्पोंका हार सुशोभित है। एक-दूसरीसे अपनी बाँहोंको मिलाये हुए नृत्य करनेवाली गोपाङ्गनाओंकी बाहु-वल्लरियोंसे वे घिरे हुए हैं। इस प्रकार परम सुन्दर शोभामयी दिव्य रासलीलाके लिये सदा उत्सुक रहनेवाले प्रेमके आश्रयभूत भगवान् मुकुन्दका भजन करे। वे नाना प्रकारकी श्रुतियोंके^१ भेदसे युक्त परम मनोहर सात स्वरोंकी मूर्च्छना^२ और तानोंके^३ साथ-साथ गोपाङ्गनाओंसहित थिरक रहे हैं। सुन्दर मणिमय स्वच्छ आभूषणोंके मधुर शिञ्जनसे भगवान्का सम्पूर्ण मनोहर अङ्ग ही झनकारमय हो उठा है। एक-दूसरीसे हाथ बाँधकर मण्डलाकार खड़ी हुई गोपाङ्गनाओंके समूहसे कल्पित रासलीलामण्डलकी रचनामें यद्यपि भगवान् श्यामसुन्दर बीचमें मणिमय मेखकी भाँति स्थित हैं तथापि इसी शरीरसे उन्होंने अपने बहुत-से दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिये हैं (और उन स्वरूपोंसे प्रत्येक दो गोपीके बीचमें स्थित हैं)।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान्की पूजा करे। हृदयादि अङ्गोंद्वारा प्रथम आवरणकी पूजा होती है। धन-सम्पत्तिकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ वैष्णव पूर्वोक्त केशव-कीर्ति आदि सोलह जोड़ोंकी कमलपुष्पोंद्वारा पूजा करे। उन सबके नामके आदिमें क्रमशः सोलह स्वरोंको संयुक्त करे^४। तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्पालों और वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। एक मोटा, गोल
१. संगीतमें किसी सप्तकके बाईस भागोंमेंसे एक भाग अथवा किसी स्वरके एक अंशको श्रुति कहते हैं। स्वरका आरम्भ और अन्त इसीसे होता है। षड्जमें चार, ऋषभमें तीन, गान्धारमें दो, मध्यम और पञ्चममें चार-चार, धैवतमें तीन और निषादमें दो श्रुतियाँ होती हैं।
२. संगीतमें एक ग्रामसे दूसरे ग्रामतक जानेमें सातों स्वरोंका जो आरोहावरोह होता है, उसीका नाम मूर्च्छना है। ग्रामके सातवें भागको ही मूर्च्छना कहते हैं। भरत मुनिके मतसे गाते समय गलेकी कँपकँपीसे ही मूर्च्छना होती है। किसी-किसीके मतसे स्वरके सूक्ष्म विरामका नाम मूर्च्छना है। तीन ग्राम होनेके कारण इक्कीस मूर्च्छनाएँ होती हैं।
३. मूर्च्छना आदिद्वारा राग या स्वरके विस्तारको तान कहते हैं। संगीत दामोदरके मतसे स्वरोंसे उत्पन्न तान ४९ हैं। इन ४९ तानोंसे भी ८,३०० कूट तान निकलते हैं। किसी-किसीके मतसे कूट तानोंकी संख्या ५०४० भी मानी गयी है।
१. केशव-कीर्ति, नारायण-कान्ति, माधव-तुष्टि, गोविन्द-पुष्टि, विष्णु-धृति, मधुसूदन-शान्ति, त्रिविक्रम-क्रिया, वामन-दया, श्रीधर-मेधा, हृषीकेश-हर्षा, पद्मनाभ-श्रद्धा, दामोदर-लज्जा, वासुदेव-लक्ष्मी, संकर्षण-सरस्वती, प्रद्युम्न-प्रीति और अनिरुद्ध-रति—ये सोलह जोड़े हैं। इनके आदिमें क्रमशः 'अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः' इन सोलह स्वरोंको अनुस्वार युक्त करके जोड़ना चाहिये। यथा—'अं केशवकीर्तिभ्यां नमः, आं नारायणकान्तिभ्यां कान्त्यै नमः' इत्यादि। इन्हीं मन्त्रोंसे इनकी पूजा करनी चाहिये।