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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 600

५९८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


ब्राह्मण श्राद्धमें भोजन कर लेनेपर उस श्राद्धको और श्राद्धकर्ताके पुण्यकृत पुण्यको भी नष्ट कर देता है, उसी प्रकार पूर्वविद्धा तिथिमें किये हुए दान, जप, होम, स्नान तथा भगवत्पूजन आदि कर्म सूर्योदयकालमें अन्धकारकी भाँति नष्ट हो जाते हैं।


रुक्माङ्गदके राज्यमें एकादशीव्रतके प्रभावसे सबका वैकुण्ठगमन, यमराज आदिका चिन्तित होना, नारदजीसे उनका वार्तालाप तथा ब्रह्मलोक-गमन

ऋषि बोले— सूतजी! अब भगवान् विष्णुके आराधनकर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिससे भगवान् संतुष्ट होते और अभीष्ट वस्तु प्रदान करते हैं। भगवान् लक्ष्मीपति सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। यह चराचर जगत् उन्हींका स्वरूप है। वे समस्त पापराशियोंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीहरि किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं?

सौतिने कहा— ब्राह्मणो! धरणीधर भगवान् हृषीकेश भक्तिसे ही वशमें होते हैं, धनसे नहीं। भक्तिभावसे पूजित होनेपर श्रीविष्णु सब मनोरथ पूर्ण कर देते हैं। अतः ब्राह्मणो! चक्रसुदर्शनधारी भगवान् श्रीहरिकी सदा भक्ति करनी चाहिये। जलसे भी पूजन करनेपर भगवान् जगन्नाथ सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश कर देते हैं। जैसे प्यासा मनुष्य जलसे तृप्त होता है। उसी प्रकार उस पूजनसे भगवान् शीघ्र संतुष्ट होते हैं। ब्राह्मणो! इस विषयमें एक पापनाशक उपाख्यान सुना जाता है, जिसमें महर्षि गौतमके साथ राजा रुक्माङ्गदके संवादका वर्णन है। प्राचीन कालमें रुक्माङ्गद नामसे प्रसिद्ध एक सार्वभौम राजा हो गये हैं। वे सब प्राणियोंके प्रति क्षमाभाव रखते थे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णु उनके प्रिय आराध्यदेव थे। वे भगवद्भक्त तो थे ही, सदा एकादशीव्रतके पालनमें तत्पर रहते थे। राजा रुक्माङ्गद इस जगत्में देवेश्वर भगवान् पद्मनाभके सिवा और किसीको नहीं देखते थे। उनकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि थी। वे एकादशीके दिन हाथीपर नगाड़ा रखकर बजवाते और सब ओर यह घोषणा कराते थे कि 'आज एकादशी तिथि है। आजके दिन आठ वर्षसे अधिक और पचासी वर्षसे कम आयुवाला जो मन्दबुद्धि मनुष्य भोजन करेगा, वह मेरे द्वारा दण्डनीय होगा, उसे नगरसे निर्वासित कर दिया जायगा। औरोंकी तो बात ही क्या, पिता, भ्राता, पुत्र, पत्नी और मेरा मित्र ही क्यों न हो, यदि वह एकादशीके दिन भोजन करेगा तो उसे कठोर दण्ड दिया जायगा। आज गङ्गाजीके जलमें गोते लगाओ, श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दो।' द्विजवरो! राजाके इस प्रकार घोषणा करानेपर सब लोग एकादशीव्रत करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाने लगे। ब्राह्मणो! इस प्रकार वैकुण्ठधामका मार्ग लोगोंसे भर गया। उस राजाके राज्यमें जो लोग भी मृत्युको प्राप्त होते थे, वे भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते थे।

ब्राह्मणो! सूर्यनन्दन प्रेतराज यम दयनीय स्थितिमें पहुँच गये थे। चित्रगुप्तको उस समय लिखने-पढ़नेके कामसे छुट्टी मिल गयी थी। लोगोंके पूर्व कर्मोंके सारे लेख मिटा दिये गये। मनुष्य अपने धर्मके प्रभावसे क्षणभरमें वैकुण्ठधामको चले जाते थे। सम्पूर्ण नरक सूने हो गये। कहीं कोई पापी जीव नहीं रह गया था। बारह सूर्योंके तेजसे तप्त होनेवाला यमलोकका मार्ग नष्ट हो गया। सब लोग गरुड़की पीठपर बैठकर भगवान् विष्णुके धामको चले जाते थे। मर्त्यलोकके मानव एकमात्र एकादशीको छोड़कर और कोई व्रत आदि नहीं