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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 602 of 770

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Page 602

६०० * संक्षिप्त नारदपुराण *

सूर्यपुत्र यमराज यहाँ लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये पधारे हुए हैं? क्या इनके पास इस समय कोई कार्य नहीं है? इनको तो एक क्षणका भी अवकाश नहीं मिलता है; ये सूर्यनन्दन यम सदा अपने कार्योंमें ही व्यग्र रहते हैं, फिर भी आज यहाँ कैसे आ गये? देवता लोग सकुशल तो हैं? सबसे बढ़कर आश्चर्य तो यह मालूम होता है कि ये लेखक महोदय (चित्रगुप्तजी) बड़ी दीनताके साथ यहाँ उपस्थित हुए हैं और इनके हाथमें जो पट है, जिसपर जीवोंका शुभाशुभ कर्म लिखा जाता है, उसका सब लेख मिटा दिया गया है। अबतक किसी भी धर्मात्माने इनके पटपर लिखे हुए लेखको नहीं मिटाया था। अबतक जो बात देखने और सुननेमें नहीं आयी थी, वह यहीं प्रत्यक्ष दिखायी देती है।'

ब्राह्मणो! ब्रह्माजीके सभासद् जब इस प्रकारकी बातें कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण भूतोंका शासन करनेवाले सूर्यपुत्र यम पितामहके चरणोंमें गिर पड़े और बोले—'देवेश्वर! मेरा बड़ा तिरस्कार हुआ है। मेरे पटपर जो कुछ लिखा गया था, सब मिटा दिया गया। कमलासन! आप-जैसे स्वामीके रहते हुए मैं अपनेको अनाथ देख रहा हूँ।' द्विजवरो! ऐसा कहकर धर्मराज निश्चेष्ट हो गये। फिर उदारचित्तवाले लोकमूर्ति वायुदेवने अपनी सुन्दर एवं मोटी भुजाओंसे यमराजके संदेहका निवारण करते हुए उन्हें धीरे-धीरे उठाया और उन धर्मराज और चित्रगुप्तको आसनपर बिठाया।


यमराजके द्वारा ब्रह्माजीसे अपने कष्टका निवेदन और रुक्माङ्गदके प्रभावका वर्णन

तब यमराज बोले—पितामह! पितामह!! नाथ! मेरी बात सुनिये। देव! किसीके प्रभावका जो खण्डन है, वह मृत्युसे भी अधिक दुःखदायक होता है। कमलोद्भव! जो पुरुष कार्यमें नियुक्त होकर स्वामीके उस आदेशका पालन नहीं करता; किंतु उनसे वेतन लेकर खाता है, वह काठका कीड़ा होता है। जो लोभवश प्रजा अथवा राजासे धन लेकर खाता है, वह कर्मचारी तीन सौ कल्पोंतक नरकमें पड़ा रहता है। जो अपना काम बनाता और स्वामीको लूटता है, वह मन्दबुद्धि मानव तीन सौ कल्पोंतक घरका चूहा होता है। जो राजकर्मचारी राजाके सेवकोंको अपने घरके काममें लगाता है, वह बिल्ली होता है। देव! मैं आपकी आज्ञासे धर्मपूर्वक प्रजाका शासन करता था। प्रभो! मैं मुनियों तथा धर्मशास्त्र आदिके द्वारा भलीभाँति विचार करके पुण्यकर्म करनेवालेको पुण्यफलसे और पाप करनेवालेको पापके फलसे संयुक्त करता था। कल्पके आदिसे लेकर जबतक आपका वह दिन पूरा होता है, तबतक आपके ही आदेशके अनुसार मैं सब काम करता आया हूँ और आगे भी कर सकता हूँ, किंतु आज राजा रुक्माङ्गदने मेरा महान् तिरस्कार कर दिया है। जगन्नाथ! उस राजाके भयसे समुद्रोंद्वारा घिरी हुई समूची पृथ्वीके लोग सर्वपापनाशक एकादशीके दिन भोजन नहीं करते हैं और उसके प्रभावसे भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हैं; वह भी अकेले नहीं, पितरों और पितामहोंको भी साथ ले लेते हैं। इस लोकमें व्रत करनेवालोंके पितर तो वैकुण्ठलोकमें जाते ही हैं, उनके पितरोंके पितर तथा माताके पिता-मातामह आदि भी विष्णुधामको चले जाते हैं, फिर उन सबके भी जो पिता-माता आदि हैं, उनके पूर्वज भी वैकुण्ठवासी हो जाते हैं। यही नहीं, उनकी पत्नियोंके पितर भी मेरी लिपिको मिटाकर विष्णुधामको चले जाते