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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 605 of 770

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Page 605
  • उत्तरभाग * ६०३

स्तवन अथवा उनके लिये उपवासव्रत करेंगे, उनपर मैं कोई शासन नहीं करूँगा। जो मनुष्य किसी दूसरे व्याजसे भी सहसा हरि-नामका उच्चारण कर लेते हैं, वे माताके गर्भसे छुटकारा पा जाते हैं। वे चतुर मानव मेरे पटके लेखमें नहीं आते तथा देवताओंके समुदाय भी उन्हें नमस्कार करते हैं*।

सौति कहते हैं— वैवस्वत यमके कार्यसे और उनके सम्मानकी रक्षा करनेके लिये (और रुक्माङ्गदका गौरव बढ़ानेके लिये) देवेश्वर ब्रह्माजीने कुछ देरतक विचार किया। सम्पूर्ण प्राणियोंसे विभूषित भगवान् ब्रह्माने क्षणभर चिन्तन करनेके पश्चात् सम्पूर्ण लोकको मोहमें डालनेवाली एक नारीको उत्पन्न किया। ब्रह्माजीके मनसे निर्मित हुई वह देवी संसारकी समस्त सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ एवं प्रकाशमान थी। सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित हो वह उनके आगे खड़ी हुई। रूपके वैभवसे सम्पन्न उस सुन्दरीको सामने देख ब्रह्माजीने अपनी आँखें मूंद लीं। उन्होंने इस बातपर भी लक्ष्य किया कि मेरे स्वजन काममोहित होकर इस सुन्दरीकी ओर देख रहे हैं। तब उन्होंने उन सबको समझाते हुए कहा—'जो यहाँ माता, पुत्री, पुत्रवधू, भौजाई, गुरुपत्नी तथा राजाकी रानीकी ओर रागयुक्त मन और आसक्तिपूर्ण दृष्टिसे देखता या उनका चिन्तन करता है, वह घोर नरकमें पड़ता है। जो मनुष्य इन प्रमदाओंको देखकर क्षोभको प्राप्त होता है, उसका जन्मभरका किया हुआ पुण्य व्यर्थ हो जाता है। यदि उन रमणियोंका सङ्ग करे तो दस हजार जन्मोंका पुण्य नष्ट होता है और पुण्यका नाश होनेसे पापी मनुष्य अवश्य ही पहाड़ी चूहा होता है; अतः विद्वान् पुरुष इन युवतियोंको न तो रागयुक्त दृष्टिसे देखे और न रागयुक्त हृदयसे इनका चिन्तन ही करे।

धर्मराज ! जो पुत्रवधू अपने श्वशुरको अपने खुले अङ्ग दिखाती है, उसके हाथ और पैर गल जाते हैं तथा वह 'कृमिभक्ष' नामक नरकमें पड़ती है। जो पापी मनुष्य पुत्रवधूके हाथसे पैर धुलवाता, स्नान करता अथवा शरीरमें तेल आदि मालिश कराता है, उसकी भी ऐसी ही गति होती है। वह एक कल्पतक काले रंगके मुखवाले 'सूचीमुख' नामक कीड़ोंका भक्ष्य बना रहता है। अतः मनुष्य कामनायुक्त मनसे किसी भी नारीकी ओर विशेषतः पुत्री अथवा पुत्रवधूकी ओर न देखे। जो देखता है, वह उसी क्षण पतित हो जाता है। इस प्रकार विचार करके ब्रह्माजीने अपनी दृष्टि और सूक्ष्म कर ली और कहा—'यह जो गोल-गोल और कुछ ऊँचाई लिये हुए सुन्दर मुँह दिखायी देता है, वह हड्डियोंका ढाँचामात्र ही तो है, जो चर्म और मांससे ढका


* हरिरिति सहसा ये संगृणन्ति च्छलेन जननिजठरमार्गात्ते विमुक्ता हि मर्त्याः।
मम पटविलिपिं ते नो विशन्ति प्रवीणा दिविचरवरसङ्घैस्ते नमस्या भवन्ति॥
(ना० उत्तर० ७। ६)