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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 670

६६८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके सिंहासनपर विराजमान होनेवाली तेजोमयी आप गङ्गादेवीको नमस्कार है। आप मन्द गति धारण करके 'मन्दा' और शिवलिङ्गका आधार होनेसे 'लिङ्गधारिणी' कहलाती हैं। भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंसे प्रकट होनेके कारण आप 'नारायणी' कहलाती हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को मित्र माननेवाली आप विश्वमित्राको नमस्कार है। रेवती नामसे प्रसिद्ध गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। आप बृहतीदेवीको नित्य नमस्कार है। लोकधात्रीको बारंबार नमस्कार है। विश्वमें प्रधान होनेसे आपका नाम विश्वमुख्या है, आपको नमस्कार है। जगत्‌को आनन्दित करनेके कारण नन्दिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। पृथ्वी¹, शिवामृता² और विरजा³ नामवाली गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। परावरगता⁴, आद्या⁵ एवं तारा⁶ नामवाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वर्गमें विराजमान गङ्गादेवी ! आपको नमस्कार है। आप सबसे अभिन्न हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्त-स्वरूपा, प्रतिष्ठा (आधारस्वरूपा) तथा वरदायिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप उग्रा⁷, मुखजल्पा⁸ और संजीवनी⁹ हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपकी ब्रह्मलोकतक पहुँच है। आप ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली तथा पापनाशिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली जगन्माता गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। देवि ! आप जल-बिन्दुओंकी राशि हैं, दुर्गम संकटका नाश करनेवाली तथा जगत्‌के उद्धारमें दक्ष हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विपत्तियोंका विरोध करनेवाली मङ्गलमयी गङ्गादेवीको नमस्कार है, नमस्कार है। पर और अपर सब आपके ही स्वरूप हैं, आप ही पराशक्ति हैं, मोक्षदायिनी देवि ! आपको सदा नमस्कार है। गङ्गा मेरे आगे रहें, गङ्गा मेरे दोनों पार्श्वमें रहें, गङ्गा मेरे चारों ओर रहें और हे गङ्गे ! आपमें ही मेरी स्थिति हो। पृथ्वीपर प्राप्त हुई शिवस्वरूपा देवि ! आदि, मध्य और अन्तमें आप ही हैं। आप सर्वस्वरूपा हैं। आप ही मूल प्रकृति हैं। आप ही सर्वसमर्थ नर-नारायण हैं। गङ्गे ! आप ही परमात्मा और आप ही शिव हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है¹⁰।


१. पृथ्वीपर स्थित होने अथवा पृथुल जलराशि धारण करनेके कारण गङ्गाजीका नाम 'पृथ्वी' है। भगवदीय शक्ति होनेसे गङ्गा और पृथ्वीमें अभेद भी है।
२. शिव (कल्याणमय) हैं अमृत (जल) जिनका, वे गङ्गाजी 'शिवामृता' हैं, शिवस्वरूपा और अमृतस्वरूपा होनेके कारण उनका यह नाम सार्थक है।
३. रजोगुणरहित, निर्मलस्वरूप होनेके कारण गङ्गाजीको 'विरजा' कहते हैं। गोलोकस्थित विरजासे अभिन्न होनेके कारण भी इनका नाम 'विरजा' है।
४. पर (ऊपर स्वर्गलोक) और अवर (नीचे पाताललोक)-में स्थित।
५. आदिशक्तिस्वरूपा।
६. सबको संसार-सागरसे तारनेवाली अथवा 'तारा' नामक शक्तिसे अभिन्न।
७. पाप-समुदायके लिये भयंकर।
८. अपने स्रोतरूप मुखसे निरन्तर कलकल शब्द करनेवाली।
९. सेवकोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ाकर नूतन अमृतमय जीवन प्रदान करनेवाली।
१०. ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमोऽस्तु ते। नमोऽस्तु विष्णुरूपिण्यै गङ्गायै ते नमो नमः॥
सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये। सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्श्रेष्ठे नमोऽस्तु ते॥
स्थाणुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्रि नमोऽस्तु ते। संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमो नमः॥