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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 673
  • उत्तरभाग * ६७१

है। तीरको छोड़कर क्षेत्रमें वास करना चाहिये; क्योंकि तीरपर निवास अभीष्ट नहीं है। दोनों तटोंसे एक योजन विस्तृत भू-भाग क्षेत्रकी सीमा माना गया है। जितने पाप हैं, वे सब-के-सब गङ्गाजीकी सीमा नहीं लाँघते। वे गङ्गाको देखकर उसी प्रकार दूर भागते हैं, जैसे सिंहको देखकर वनमें रहनेवाले दूसरे जीव। महाभागे! जहाँ गङ्गा हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीशिवका तपोवन है, उसके चारों ओर तीन योजनतक सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये। तीर्थमें कभी दान न ले। पवित्र देव-मन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह न ले तथा ग्रहण आदि सभी निमित्तोंमें मनुष्य प्रतिग्रहसे अलग रहे। जो तीर्थमें दान लेता है तथा पुण्यमय देवमन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह स्वीकार करता है, उसके पास जबतक प्रतिग्रहका धन है, तबतक उसका तीर्थ-व्रत निष्फल कहा जाता है। देवि! गङ्गाजीमें दान लेना मानो गङ्गाको बेचना है। गङ्गाके विक्रयसे भगवान् विष्णुका विक्रय हो जाता है और भगवान् विष्णुका विक्रय होनेपर तीनों लोकोंका विक्रय हो जाता है। जो गङ्गाजीके तीरकी मिट्टी लेकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह केवल तम (अन्धकार, अज्ञान एवं तमोगुण)-का नाश करनेके लिये मानो सूर्यका स्वरूप धारण करता है। जो मनुष्य गङ्गाजीके तटकी धूलि फैलाकर उसके ऊपर पितरोंके लिये पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको तृप्त करके स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। भद्रे! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताया है। जो मनुष्य इसको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! जो भगवान् विष्णु अथवा शिवका लोक प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन पवित्रचित्त हो श्रद्धा और भक्तिके साथ इस गङ्गा-माहात्म्यका पाठ करना चाहिये।


गयातीर्थकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर पापनाशिनी गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहितसे पूछा।

मोहिनी बोली— भगवन्! आपने मुझे गङ्गाका पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया है। अब मैं यह सुनना चाहती हूँ कि संसारमें गयातीर्थ कैसे विख्यात हुआ?

पुरोहित वसुने कहा— गया पितृतीर्थ है। उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया है, जहाँ देवदेवेश्वर पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते हैं। जहाँ याग (श्राद्ध)-की अभिलाषा रखनेवाले पितरोंने यह गाथा गायी है—'बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा अश्वमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका उत्सर्ग करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य सारसे भी सारतर वस्तु है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। सुनो, पूर्वकालकी बात है। गयासुर नामसे प्रसिद्ध एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने बड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्ण भूतोंको पीड़ित करनेवाला था। उसकी तपस्यासे संतप्त हुए देवता लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया। अतः गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमें मुक्तिदाता माने गये हैं। भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा स्थापित की। जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान एवं स्नानादि कर्म करता है, वह स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर ब्रह्माजीने वहाँ यज्ञ किया तथा उन्होंने वहाँ सरस्वती नदीकी भी सृष्टि की और समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास