संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- उत्तरभाग * ६९१
करे तो वह क्षणमात्रमें कैवल्य-मोक्षका भागी होता है। काशीपुरी, श्मशानघाट, अविमुक्तस्थान और अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शिवगणोंका अधिपति होता है। अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करनेसे मानव सम्पूर्ण पापों, रोगों तथा पशुपाश (जीवके अज्ञानमय बन्धन)-से मुक्त हो जाता है।
अविमुक्तके आगे एक शिवलिङ्ग स्थित है, जिसका मुख पश्चिमकी ओर है। भद्रे! वह 'लक्षणेश्वर' नामसे विख्यात है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। देवि! उसके उत्तरमें चतुर्मुख लिङ्ग है, जो चतुर्थेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह श्रेष्ठ शिवलिङ्ग पाप-भयका निवारण करनेवाला है। वाराणसी नामक क्षेत्र पृथ्वीपर प्राणियोंके लिये मुक्तिदायक है। उसमें भी अविमुक्तेश्वर तो जीवन्मुक्त कहा गया है (वह जीवन्मुक्ति देनेवाला है)। काशीमें जहाँ-कहीं भी जो रह चुका है, उसके लिये गणपति-पदकी प्राप्ति बतायी गयी है और जो वहाँ प्राण-त्याग करता है, वह आत्यन्तिक मोक्षको प्राप्त करता है। उपर्युक्त सीमाके भीतरी क्षेत्रमें प्रथम आवरण बताया गया है। द्वितीय आवरणमें पूर्व दिशामें मणिकर्णिका है। उस स्थानमें सात करोड़ शिवलिङ्ग विद्यमान हैं। उनके दर्शनमात्रसे यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। ये सब सिद्ध लिङ्ग हैं। काशीमें जो पवित्र कूप, सरोवर, बावड़ी, नदी और कुण्ड कहे गये हैं, वे ही सिद्धपीठ हैं। जो एकाग्रचित्त हो इन सबमें स्नान करेगा और वहाँके शिवलिङ्गोंका दर्शन करेगा, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं ले सकता। पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें जो-जो तीर्थ हैं, उनमें मुख्य तीर्थोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। वरारोहे! तीर्थयात्राको सब पापोंका नाश करनेवाली कहा गया है।
काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोंके लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर तीर्थ और शिवलिङ्गोंका वर्णन
पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! अब मैं यात्राकालका वर्णन करता हूँ, जिसे देवता आदिने नियत किया है। वह यात्रा यथायोग्य फलकी प्राप्ति करानेवाली है। पूर्वकालमें देवताओंने काशीमें रहकर चैत्र मासमें यह तीर्थयात्रा की थी। वे कामकुण्डपर स्थित होकर स्नान एवं पूजनमें तत्पर रहते थे। शुभानने! ज्येष्ठ मासमें रुद्रावास कुण्डपर स्नान-पूजामें तत्पर रहनेवाले सिद्धोंने वहाँकी शुभ यात्रा की है। गन्धर्वोंने आषाढ़ मासमें यहाँकी यात्रा की थी। वे प्रियादेवी-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन किया करते थे। मोहिनी! विद्याधरोंने श्रावण मासमें यह यात्रा की थी। वे लक्ष्मीकुण्डपर रहकर स्नान-पूजन करते थे। वरानने! यक्षोंने आश्विन मासमें यह यात्रा सम्पन्न की है। वे मार्कण्डेय-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजनमें संलग्न थे। मोहिनी! नागोंने मार्गशीर्ष मासमें यह यात्रा की है। वे कोटितीर्थमें रहकर स्नान-पूजन आदि करते थे। शुभलोचने! गुह्यकोंने कपालमोचनतीर्थमें रहकर स्नान-ध्यान एवं पूजन आदि करते हुए पौष मासमें यहाँकी यात्रा सम्पन्न की है। शोभने! पिशाचोंने फाल्गुन मासमें काशीकी यात्रा की थी। वे कालेश्वर-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन आदिमें तत्पर रहते थे। देवि! शुभ फाल्गुन मासमें शुक्ल पक्षकी जो चतुर्दशी है, उसीमें पिशाचोंने यात्रा की थी। इसीलिये उसे 'पिशाच-चतुर्दशी' कहते हैं।
शुभानने! अब मैं यात्राका आवश्यक कृत्य बतलाऊँगा, जिसके करनेसे मनुष्य यात्राका फल पाता है। यात्राके समय जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ोंको वस्त्रसे ढककर फल, फूल और