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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 764

७६२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


इस पृथ्वीपर वृन्दावनके समान कीर्तिवर्धक स्थान दूसरा कोई नहीं है।

प्राचीन कल्पकी बात है। वृन्दावनमें गोवर्धन नामके एक द्विजने बड़ी भारी तपस्या की। वह समस्त संसारसे विरक्त हो गया था। देवताओंके स्वामी अविनाशी भगवान् विष्णु अपनी लीलाभूमिमें उस ब्राह्मणको वर देनेके लिये गये। ब्राह्मणने देखा देवदेवेश्वर श्रीहरिने अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे हैं। उनका वक्षःस्थल सुन्दर कौस्तुभमणिसे सुशोभित है। कानोंमें मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। माथेपर सुन्दर किरीट चमक रहा है। हाथोंमें कड़े शोभा पाते हैं। पैरोंमें मधुर रुनझुन करनेवाले नूपुर शोभा दे रहे हैं। उनका आगेका पूरा अङ्ग वनमालासे घिर गया है। वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है। नूतन मेघके समान श्यामवर्ण शरीरपर विद्युत्की-सी कान्तिवाला रेशमी पीताम्बर प्रकाशित हो रहा है। नाभि और ग्रीवा सुन्दर हैं। कपोल और नासिका सुघर हैं। दाँतोंकी पङ्क्ति स्वच्छ है। मुखपर मनोहर मुसकानकी छटा छा रही है। जानु, ऊरु, भुजाएँ तथा शरीरका मध्यभाग सुन्दर हैं। कृपाके तो वे महासागर ही हैं। सदा आनन्दमें डूबे रहते हैं। इनके मुखारविन्दसे सदा प्रसन्नता बरसती रहती है। इस प्रकार भगवान्‌की झाँकी देखकर ब्राह्मण सहसा उठ खड़े हुए और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति लेटकर उन्होंने भगवान्‌को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर भगवान्‌के द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर गोवर्धन ब्राह्मण श्रीहरिसे बोले— 'प्रभो! आप मुझे दोनों चरणोंसे दबाकर मेरी पीठपर खड़े रहें, यही मेरे लिये वर है।' गोवर्धनका यह वचन सुनकर भक्तवत्सल भगवान्‌ने बार-बार इसपर विचार किया; फिर वे उसकी पीठपर चढ़कर खड़े हो गये। तब ब्राह्मणने फिर कहा—'देव! जगत्पते! मेरी पीठपर खड़े हुए आपको अब मैं उतार नहीं सकता, इसलिये इसी रूपमें स्थित हो जाइये।' तभीसे विश्वात्मा भगवान् पर्वतरूपधारी गोवर्धन ब्राह्मणका त्याग न करके प्रतिदिन योगीवनमें जाते हैं।

कृष्णावतारमें भगवान्‌ने गोवर्धन ब्राह्मणको अपने सारूप्यभावको प्राप्त हुआ जानकर उसे नन्द आदिके द्वारा गिरिराज-पूजनके व्याजसे भोजन कराया। अन्नकूट तथा दुग्ध आदिके द्वारा पर्वतरूपधारी ब्राह्मणको तृप्त करनेके पश्चात् उसे प्यासा जानकर भगवान्‌ने नूतन मेघोंका जल पिलाया। इस कार्यसे भगवान् वासुदेवका वह मित्र हो गया। देवि! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक विभिन्न उपचारोंसे गोवर्धन पर्वतकी पूजा और प्रदक्षिणभावसे परिक्रमा करता है, उसका फिर