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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

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१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३


पादन्यासोुरुवेगेन प्रभग्नाः पादपा भृशम्। ततो दैत्योऽपि तां तन्वीं विहायाशु पलायितः ॥ ४५ तथापि चार्जुनो तस्य कोपान्मुञ्चति नासुरम्। पतितो मेदिनीपृष्ठे तावदेव चतुर्भुजः ॥ ४६ पीते च वाससी बिभ्रत् शङ्खचक्रायुधानि च। ततः स विस्मयाक्रान्तो नत्वा पार्थो वचोऽवदत् ॥ ४७

अर्जुन उवाच कथं कृतेषा भगवंस्त्वया मायात्र वैष्णवी। मयाप्यपकृतं नाथ तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते ॥ ४८ नूनमज्ञानभावेन कर्मैतद्दारुणं मया। तत्क्षन्तव्यं जगन्नाथ चैतन्यं मानवे कुतः ॥ ४९

चतुर्भुज उवाच नाहं कृष्णो महाबाहो बहुरोमास्मि दानवः। उपयातो हरेर्देहं पूर्वकर्मप्रभावतः ॥ ५०

अर्जुन उवाच बहुरोमन् पूर्वजातिं कर्म मे शंस तत्त्वतः। केन कर्मविपाकेन विष्णोः सारूप्यमाप्तवान् ॥ ५१

चतुर्भुज उवाच शृण्वर्जुन महाभाग सहितो भ्रातृभिर्मम। चरितं चित्रमत्यर्थं शृण्वतां मुदवर्धनम् ॥ ५२ अहमासं पुरा राजा सोमवंशसमुद्भवः। जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥ ५३ विष्णोर्देवालये नित्यं सम्मार्जनपरायणः। उपलेपरतश्चैव दीपदाने समुद्यतः ॥ ५४ वीतिहोत्र इति ख्यात आसीत् साधुपुरोहितः। मम तच्चरितं दृष्ट्वा विप्रो विस्मयमागतः ॥ ५५

मार्कण्डेय उवाच कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम्। अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ५६ राजन् परमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण। विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि पुरुषर्षभ ॥ ५७ सम्मार्जनपरो नित्यं उपलेपरतस्तथा। तन्मे वद महाभाग त्वया किं विदितं फलम् ॥ ५८


हिन्दी अनुवाद

उस समय उनके बड़े वेगसे पैर रखनेके कारण अनेकानेक वृक्ष गिर गये। तब वह दैत्य भी उस तन्वङ्गीको छोड़कर अकेला ही वेगसे भागा; तथापि अर्जुनने क्रोधके कारण उस असुरका पीछा न छोड़ा। भागते-भागते वह दानव एक जगह पृथ्वीपर गिर पड़ा और गिरते ही चार भुजाओंसे युक्त हो, शङ्ख तथा चक्र आदि धारण किये पीताम्बरधारी विष्णुके रूपमें दीख पड़ा। तब कुन्तीनन्दन अर्जुन बड़े ही विस्मित हुए और प्रणाम करके बोले ॥ ४१-४७॥

अर्जुनने कहा— भगवन्! आपने यहाँ वैष्णवी माया क्यों फैला रखी थी? मैंने भी जो आपका अपकार किया है, उसके लिये हे नाथ! मेरे अपराधको क्षमा करें; आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ! अज्ञानके कारण ही मैंने यह दारुण कर्म किया है; इसलिये इसे क्षमा कर दें। भला, एक साधारण मनुष्यमें इतनी समझ कहाँ हो सकती है, जिससे आपको अन्य वेषमें भी पहचान ले ॥ ४८-४९॥

चतुर्भुज बोला— महाबाहो! मैं विष्णु नहीं, बहुरोमा नामक दानव हूँ। मैंने अपने पूर्वकर्मके प्रभावसे भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है ॥ ५० ॥

अर्जुन बोले— बहुरोमन्! तुम अपने पूर्वजन्म और कर्मका ठीक-ठीक वर्णन करो। तुमने किस कर्मके परिणामसे विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है? ॥ ५१ ॥

चतुर्भुज बोला— महाभाग अर्जुन! आप अपने भाइयोंके साथ मेरे अत्यन्त विचित्र चरित्रको सुनिये; यह श्रोताओंके आनन्दको बढ़ानेवाला है। मैं पूर्वजन्ममें चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात राजा था। उस समय सदा ही मैं भगवान् नारायणके भजनमें लगा रहता और उनके मन्दिरमें झाडू लगाया करता था। प्रतिदिन उस मन्दिरको लीपता और [रात्रिमें] वहाँ दीप जलाया करता था। उन दिनों वीतिहोत्र नामक एक साधु ब्राह्मण मेरे यहाँ पुरोहित थे। प्रभो! वे मेरे इस कार्यको देखकर बहुत विस्मित हुए ॥ ५२-५५॥

मार्कण्डेयजी बोले— एक दिन वेद-वेदाङ्गोंके पूर्ण विद्वान् पुरोहित वीतिहोत्रजीने बैठे हुए उन विष्णुभक्त राजासे इस प्रकार प्रश्न किया— परम धर्मज्ञ भूपाल! हरिभक्तिपरायण नरश्रेष्ठ! आप विष्णुभक्त पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप भगवान्‌के मन्दिरमें प्रतिदिन झाडू तथा लेप दिया करते हैं। अतः महाभाग! आप मुझे बताइये कि भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और वहाँ लीपने-पोतनेका कौन-सा उत्तम फल आप जानते हैं।


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