संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ बारहवाँ अध्याय यम और यमीका संवाद * सूत उवाच सूतजी बोले- समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली श्रुत्वेमाममृतां पुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । और अमृतके समान मधुर इस पावन कथाको सुनकर धर्मात्मा शुकदेवजी तृप्त न हुए—उनकी श्रवणविषयक अवितृप्तः स धर्मात्मा शुको व्यासमभाषत ॥ १ इच्छा बढ़ती ही गयी; अतः वे व्यासजीसे बोले ॥ १ ॥ श्रीशुक उवाच श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! बुद्धिमान् अहोऽतीव तपश्चर्या मार्कण्डेयस्य धीमतः । मार्कण्डेयजीकी तपस्या बड़ी भारी और अद्भुत है, जिन्होंने साक्षात् भगवान् विष्णुका दर्शन किया और मृत्युपर येन दृष्टो हरिः साक्षाद्येन मृत्युः पराजितः ॥ २ विजय पायी । तात ! पापोंको नष्ट करनेवाली इस विष्णु- न तृप्तिरस्ति मे तात श्रुत्वेमां वैष्णवीं कथाम् । सम्बन्धिनी पावन कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही पुण्यां पापहरां तात तस्मादन्यत्तु मे वद ॥ ३ है; अतः अब मुझसे कोई दूसरी कथा कहिये । महामते ! नराणां दृढचित्तानामकार्यं नेह कुर्वताम् । जिनका मन सुदृढ़ है, जो इस जगत्में कभी निषिद्ध कर्म यत्पुण्यमृषिभिः प्रोक्तं तन्मे वद महामते ॥ ४ नहीं करते, उन मनुष्योंको जिस पुण्यकी प्राप्ति ऋषियोंने बतायी है, उसे ही आप कहिये ॥ २-४ ॥ व्यास उवाच व्यासजी बोले- मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! स्थिर चित्तवाले नराणां दृढचित्तानामिह लोके परत्र च। पुरुषोंको इस लोकमें या परलोकमें जो पुण्य प्राप्त होता पुण्यं यत् स्यान्मुनिश्रेष्ठ तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ है, उसे मैं बतलाता हूँ; तुम सुनो। इसी विषयमें विद्वान् अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्। पुरुष यमीके साथ महात्मा यमके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं। अदितिके पुत्र जो यम्या च सह संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ६ विवस्वान् (सूर्य) हैं, उनके दो तेजस्वी संतानें हुईं। विवस्वानदितेः पुत्रस्तस्य पुत्रौ सुवर्चसौ। उनमें प्रथम तो 'यम' नामक पुत्र था और दूसरी उससे जज्ञाते स यमश्चैव यमी चापि यवीयसी ॥ ७ छोटी 'यमी' नामकी कन्या थी। वे दोनों अपने पिताके तौ तत्र संविवर्धेते पितुर्भवन उत्तमे। उत्तम भवनमें दिनोंदिन भलीभाँति बढ़ने लगे। वे बाल- क्रीडमानौ स्वभावेन स्वच्छन्दगमनावुभौ ॥ ८ स्वभावके अनुसार साथ-साथ खेलते-कूदते और इच्छानुसार घूमते-फिरते थे। एक दिन यमकी बहिन यमीने अपने यमी यमं समासाद्य स्वसा भ्रातरमब्रवीत् ॥ ९ भाई यमके पास जाकर कहा- ॥ ५-९॥
- यह 'यम-यमी-संवाद' ऋग्वेदके एक सूक्तपर आधारित है। वहाँ प्रसंग यह है कि यम और यमी, जो परस्पर भाई और बहन हैं, कुमारावस्थामें बालोचित खेलसे मन बहला रहे थे। उनके सामने एक ऐसा दृश्य आया, जिसमें कोई वर बाजे-गाजेके साथ विवाहके लिये जा रहा था। यमीने पूछा- 'भैया ! यह क्या है?' यमने उसे बताया कि 'यह बारात है। इसमें वर-वेषधारी पुरुष किसी कुमारी स्त्रीके साथ विवाह करेगा। फिर वे दोनों पति-पत्नी होकर गृहस्थ-जीवन व्यतीत करेंगे।' यमी बालोचित सरलताके साथ प्रस्ताव कर बैठी- 'भैया ! आओ, हम और तुम भी परस्पर विवाह कर लें।' यमने उसे समझाया कि भाईके साथ बहनका विवाह नहीं होता। तुम्हें मुझसे भिन्न किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अपना पति चुनना होगा- 'अन्यं वृणुष्व सुभगे पतिं मत्।' इसी वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, मानो यमी कामवेदनासे पीड़ित हो यमसे यह प्रार्थना कर रही हो कि-वे उसे अपनी पत्नी बनाकर उसकी इच्छा पूर्ण करें। इसमें यमीका विकारोत्पादक चित्र प्रस्तुत किया गया है और 'विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः।' (विकारका कारण उपस्थित होनेपर भी जिनके चित्तमें विकार नहीं होता, वे ही पुरुष धीर- ज्ञानी और संयमी हैं-) इस उक्ति के अनुसार यमकी जितेन्द्रियता, उनकी धर्मविषयक अविचल निष्ठा, धैर्य और विवेकको लोकके समक्ष प्रकाशमें लाया गया। जैसे सोना आगमें तपकर खरा उतरता है, उसी प्रकार यम यमीकी अग्नि-परीक्षामें उत्तीर्ण हो सुदृढ़ धर्मात्मा, संयमी और विवेकी सिद्ध हुए हैं। यमके उज्ज्वल चरित्रको और भी चमत्कारी रूपमें सामने लाना इस कथाका उद्देश्य है। इससे प्रत्येक भाई तथा नवयुवकको सदाचारी, संयमी तथा धर्ममें अविचलभावसे स्थित रहनेकी शिक्षा और प्रेरणा मिलती है। यमीके चरित्रसे यह शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक कुमारीका विवाहयोग्य अवस्था होनेपर अविलम्ब किसी योग्य वरके साथ विवाह कर देना चाहिये। वास्तवमें यम और यमी दोनों ही सूर्यदेवकी दिव्य संतानें हैं। उनमें किसी प्रकारके विकारकी लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है। लोगोंको सदाचार और संयमकी शिक्षा देनेके लिये ही व्यासजीने उस वैदिक उपाख्यानको यहाँ इस प्रकार चित्रित किया है। In Public Domain. Digitzed by 'Sarvagya Sharda Peeth