संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 94 of 318
Read in contextअध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ८३
[सूत उवाच / श्लोक २-१३] सूत उवाच चतुर्थीदिवसे राजा स्नात्वा त्रिश्रवणं द्विज । रक्ताम्बरधरो भूत्वा रक्तगन्धानुलेपनः ॥ २ सुरक्तकुसुमैर्हृद्यैर्विनायकमथार्चयत् । रक्तचन्दनतोयेन स्नानपूर्वं यथाविधि ॥ ३ विलिप्य रक्तगन्धेन रक्तपुष्पैः प्रपूजयत् । ततोऽसौ दत्तवान् धूपमाज्ययुक्तं सचन्दनम् । नैवेद्यं चैव हारिद्रं गुडखण्डघृतप्लुतम् ॥ ४ एवं सुविधिना पूज्य विनायकमथास्तवीत् ।
इक्ष्वाकुरुवाच नमस्कृत्य महादेवं स्तोष्येऽहं तं विनायकम् ॥ ५ महागणापतिं शूरमजितं ज्ञानवर्धनम् । एकदन्तं द्विदन्तं च चतुर्दन्तं चतुर्भुजम् ॥ ६ त्र्यक्षं त्रिशूलहस्तं च रक्तनेत्रं वरप्रदम् । आम्बिकेयं शूर्पकर्णं प्रचण्डं च विनायकम् ॥ ७ आरक्तं दण्डिनं चैव वह्निवक्त्रं हुतप्रियम् । अनर्चितो विघ्नकरः सर्वकार्येषु यो नृणाम् ॥ ८ तं नमामि गणाध्यक्षं भीममुग्रमुमासुतम् । मदमत्तं विरूपाक्षं भक्तविघ्ननिवारकम् ॥ ९ सूर्यकोटिप्रतीकाशं भिन्नाञ्जनसमप्रभम् । बुद्धं सुनिर्मलं शान्तं नमस्यामि विनायकम् ॥ १० नमोऽस्तु गजवक्त्राय गणानां पतये नमः । मेरुमन्दररूपाय नमः कैलासवासिने ॥ ११ विरूपाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते ब्रह्मचारिणे । भक्तस्तुताय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥ १२ त्वया पुराण पूर्वेषां देवानां कार्यसिद्धये । गजरूपं समास्थाय त्रासिताः सर्वदानवाः ॥ १३
[हिन्दी अनुवाद] सूतजी बोले— द्विज ! गणेश-चतुर्थीके दिन राजाने त्रिकाल स्नान करके रक्तवस्त्र धारण किया और लाल चन्दन लगाकर मनोहर लाल फूलों तथा रक्तचन्दनमिश्रित जलसे गणेशजीको स्नान कराके विधिवत् उनका पूजन किया। स्नान करानेके बाद उनके श्रीअङ्गोंमें लाल चन्दन लगाया। फिर रक्तपुष्पोंसे उनकी पूजा की। तदनन्तर उन्हें घृत और चन्दन मिला हुआ धूप निवेदन किया। अन्तमें हल्दी, घी और गुडखण्डके मेलसे तैयार किया हुआ मधुर नैवेद्य अर्पण किया। इस प्रकार सुन्दर विधिपूर्वक भगवान् विनायकका पूजन करके राजाने उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ २—४½ ॥ इक्ष्वाकु बोले— मैं महान् देव गणेशजीको प्रणाम करके उन विघ्नराजका स्तवन करता हूँ, जो महान् देवता एवं गणोंके स्वामी हैं, शूरवीर तथा अपराजित हैं और ज्ञानवृद्धि करानेवाले हैं। जो एक, दो तथा चार दाँतोंवाले हैं, जिनकी चार भुजाएँ हैं, जो तीन नेत्रोंसे युक्त और हाथमें त्रिशूल धारण करते हैं, जिनके नेत्र रक्तवर्ण हैं, जो वर देनेवाले हैं, जो माता पार्वतीके पुत्र हैं, जिनके सूप-जैसे कान हैं, जिनका वर्ण कुछ-कुछ लाल है, जो दण्डधारी तथा अग्निमुख हैं एवं जिन्हें होम प्रिय है तथा जो प्रथम पूजित न होनेपर मनुष्योंके सभी कार्योंमें विघ्नकारी होते हैं, उन भीमकाय और उग्र स्वभाववाले पार्वतीनन्दन गणेशजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मदसे मत्त रहते हैं, जिनके नेत्र भयंकर हैं और जो भक्तोंके विघ्न दूर करनेवाले हैं, करोड़ों सूर्यके समान जिनकी कान्ति है, खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी भाँति जिनकी श्याम प्रभा है तथा जो विमल और शान्त हैं, उन भगवान् विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ। मेरुगिरिके समान रूप और हाथीके मुख-सदृश मुखवाले, कैलासवासी गणपतिको नमस्कार है। विनायक देव ! आप विरूपधारी और ब्रह्मचारी हैं, भक्तजन आपकी स्तुति करते हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ५—१२ ॥ पुराणपुरुष ! आपने पूर्ववर्ती देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हाथीका स्वरूप धारण करके समस्त दानवोंको
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