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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु | 23


किया तो "आप ने कहा ऐसा ही होता रहा तो मैं रुकने वाला नहीं हूँ। मैं अपनी बात करने आया हूँ और चौराहें पर खड़ा होकर भी बोलूंगा, हमें भय नहीं है।'"

जो भी चीज़ विकास करती है तो उसका विरोध भी होता है। जैसे कोई अच्छा होता है तो दूसरे ईर्ष्या करने लगते हैं। मानव-तन में ये दोष हैं।

तो पाखण्डी भी आपसे ईर्ष्या करते हैं; वे रुकावटें डालते हैं। कहीं भी ओपन प्रोग्राम होता है तो वहाँ रुकावट डालने की कोशिश करते हैं। पाखण्डियों की कलयुग में चलती भी बहुत है। एक तो निरंजन की दुनिया, फिर ऊपर से महाकलयुग। ऐसे में निरंजन के चेलों ने सत्य का विरोध तो करना ही है।

आपका अधिक विकास देख व्यवधान डालने की कोशिश करें तो यह उनकी मजबूरी है। भाइयों के प्रति भी ईर्ष्या होती है। कभी-कभी अपने प्रति भी यह ईर्ष्या हो जाती है। अपने लिए भी यह ईर्ष्या स्वाभाविक हो जाती है।

जब साहिब-बंदगी पंथ छोटा था, तो कुछ बात नहीं थी, पर जैसे ही विकास हुआ तो दूसरे पंथों को परेशानी हुई। उन्होंने सतवारी, परेड ग्राउण्ड, गाँधी नगर (दशहरा ग्राउण्ड), हर जगह रुकावटें देनी शुरू की। वहाँ प्रोग्राम नहीं होने दिया। आपने किसी के सत्संग में रुकावट नहीं दी। कहीं उन्होंने आपके बड़े-बड़े पोस्टर फाड़ दिये। ये हरकतें कभी भी अच्छे लोगों की नहीं हो सकती हैं। यानी आदि निरंजन, निराकार की भक्ति के बड़े-बड़े पंथ ही हमारे देश में छाए हुए हैं, इसी निराकार, निरंजन को सन्तों ने काल पुरुष कहा। आज उन्हीं की चलती है। असल बात यह है कि वे केवल हाथी की तरह बड़े हैं, पर अंदर से खाली हैं, इसलिए उन्हें डर है कि साहिब-बंदगी पंथ के विकसित हो जाने से उनका वजूद समास हो जायेगा। पर आख़र झूठ की हार ही होती है।