निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
Page 52 of 112
Read in context52 साहिब बन्दगी
अमर लोक की बात समझाने लगे। जिसे भी समझाने की कोशिश करते, वो ही डर जाता, सोचता कि न जाने यह कौन है ! और न ही कोई आपकी बात पर विश्वास करता। इसलिए मजबूर होकर परम पुरुष को शरीर रूप में प्रगट होकर समझाना पड़ता है या किसी निर्मल शरीर को धारण करके फिर समझाना पड़ता है। पर आप माँ के पेट से शरीर लेकर नहीं आते बल्कि कोई ऐसा शरीर, जो निर्मल हो, उसे एक ठिकाने पर लगाकर उसके शरीर को दुनिया को समझाने की ख़ातिर धारण कर लेते हैं और फिर आप संतों का सृजन करते हैं ताकि जब आप उस शरीर को छोड़ दें तो उन संतों के शरीर में बैठकर फिर आप अमर लोक का संदेश संसार को देते रहें। यही कारण है कि संत और आपमें कोई भेद नहीं रह जाता है। आप उन्हीं में समाए होते हैं। आगे चलकर जब किसी के बेटे उनकी गद्दी पर आ जाते हैं भाव पिता के बाद बेटे को गद्दी मिलती है, या खून के रिशते में गद्दी दी जाती है तो संत मत लुप्त हो जाता है और निरंजन बीच में आ जाता है। बाहर से अमर लोक होता है, पर अन्दर से काल निरंजन। इसके लिए साहिब जी ने कहा-
बीज बुन्दु नहीं चले गुरवाई।
नाद बिन्द से चले गुरवाई॥
इसलिए जब-जब ये स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं तो सत्य पुरुष को पुनः स्वयं कोई शरीर ढूँढ़ना पड़ता है, जिसमें रह रही आत्मा को उसके निजधाम पहुँचा कर आप उसमें आ सकें।
जब आप संसार के जीवों को सद्गुरु की महिमा बताते हैं, उन्हें परम-पुरुष का ही रूप बताकर उनकी भक्ति करने को कहते हैं तो दुनिया कहती है कि एक इंसान की भक्ति करने को कह रहे हैं। पर इस रहस्य को कोई भी समझ नहीं पाता है। आप सद्गुरु को परम-पुरुष से यानी अपने से भी बड़ा इसलिए कहते हैं, क्योंकि आप ऐसे अपने सही