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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु
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तरह के वाद्य यंत्र बज रहे हैं। इन बाहर और भीतर दोनों से परे आप जो प्रेम की तान छेड़ते हैं, उसकी तुलना में दोनों तान फीकी पड़ जाती हैं। जो एक बार आपकी तान सुन ले, वो आपका प्रेमी होगा-ही-होगा। वो प्रेम की तान है। वो आत्मा तक जाती है। उसे आत्मा ग्रहण करती है।

कान के रास्ते से वो तान अंदर में आती है। यह भी कई तरह की है। एक तो आते ही विरह उत्पन्न कर देती है जबकि एक प्रेम की तान है, जो प्रेम भाव को उत्पन्न करती है। इनके अलावा कुछ तान सिग्नल देती हैं। मान लो कि आप सत्संग में किसी को बुलाना चाहते हैं तो एक गुप्त तरीके के साथ-२ वो खास तरह की तान सुनाकर भी बुलाते हैं।

जब प्रेम की ये तान आप सुनाते हैं तो शरीर की सुध भूल जाती है। जब तक वो तान रहती है, अपने में ही समाए रखती है। कभी वो तान पल-भर के लिए आती है तो कभी कुछ लंबे समय के लिए भी रह जाती है।

संगीत का प्रेमी उस तान को सुनकर निश्चय ही संगीत की हर तान भूल जायेगा। अनहद शब्द का प्रेमी उसे सुनकर अनहद शब्द को सुनना नहीं चाहेगा। वो तान ऐसी है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। बस, यों समझ लेना चाहिए कि जैसे प्रेम बताने में नहीं आता, ऐसे वो प्रेम की तान बताई नहीं जा सकती है।

फिर एक जो आप सुरति को पकड़कर अपना शब्द सुनाते हैं, उसकी तो बात ही नहीं की जा सकती है। वो सुनने वाला तो खो ही जायेगा। फिर उसे कहीं भी चैन नहीं आ सकता है। उसी का दीवाना वो हो जायेगा। वो इतना मीठा है कि उसके लिए कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इसलिए यह तो परम सत्य है कि आपकी हर बात निराली है। आप इस संसार के हो ही नहीं। आप स्वयं ही सब कुछ हैं, पर यह बात बोलने से दुनिया मानेगी नहीं, विश्वास नहीं करेगी, शायद इसलिए आप भी 'साहिब-साहिब' बोल रहे हैं।

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