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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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(viii)

जिसने पाखंडवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।

मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं ‘नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहुँ मैं दास कबीरा’। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।

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“जो वस्तु मेरे पास है

वह ब्रह्माण्ड में कहीं

नहीं है।”

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सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान॥

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